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मिट्टी के गांव से एशियन गेम्स के स्वर्ण मंच तक पहुंची कोरबा की बेटी संजू देवी

केराकछार की गलियों से जापान के अंतरराष्ट्रीय खेल मंच तक—दिहाड़ी मजदूर परिवार की बेटी ने कबड्डी में रचा स्वर्णिम इतिहास

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कोरबा/रायपुर। कुछ कहानियां केवल सफलता की कहानी नहीं होतीं, वे संघर्ष, संकल्प, आत्मविश्वास और उस अदम्य इच्छाशक्ति का दस्तावेज होती हैं, जो अभावों की दीवारों को लांघकर इतिहास के पन्नों तक पहुंचती हैं। छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के छोटे से गांव केराकछार की बेटी संजू देवी यादव की कहानी भी ऐसी ही कहानी है।

जिस बेटी ने गांव के सरकारी स्कूल में कक्षा पांचवीं से कबड्डी खेलना शुरू किया, जिसके परिवार की आर्थिक स्थिति सामान्य रही, जिसके पिता ड्राइविंग और दैनिक मजदूरी करते रहे—उसी संजू देवी ने आज भारतीय महिला कबड्डी टीम की सदस्य बनकर एशियन गेम्स 2026 में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीतने वाली टीम का हिस्सा बनकर देश और छत्तीसगढ़ का गौरव बढ़ाया है।

जापान के आइची-नागोया में आयोजित एशियन गेम्स 2026 के फाइनल में भारत ने ईरान को पराजित कर स्वर्ण पदक हासिल किया। इस ऐतिहासिक अभियान में कोरबा की संजू देवी की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

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1. केराकछार की उस बेटी की कहानी, जिसने गांव की सीमा को अपनी मंजिल नहीं बनने दिया

संजू देवी का मूल निवास ग्राम केराकछार, पाली विकासखंड, जिला कोरबा बताया गया है। उनका जन्म 19 दिसंबर 2002 को हुआ। उनका परिवार आर्थिक रूप से साधारण पृष्ठभूमि से जुड़ा रहा है। उनके पिता रामजी यादव ड्राइविंग और दैनिक मजदूरी का कार्य करते हैं, जबकि उनकी माता अमरिका बाई गृहिणी हैं।

सामान्य आर्थिक परिस्थितियों के बीच पली-बढ़ी संजू के सामने सुविधाओं की प्रचुरता नहीं थी, लेकिन उनके भीतर खेल के प्रति असाधारण लगाव था। यही लगाव आगे चलकर अनुशासित अभ्यास, प्रतियोगिता और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर की उपलब्धियों में परिवर्तित हुआ।

यह कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि संजू की सफलता किसी एक दिन की उपलब्धि नहीं है। यह वर्षों के अभ्यास, चयन, प्रशिक्षण, असफलताओं से सीखने और लगातार अपने खेल को बेहतर करने की प्रक्रिया का परिणाम है।

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2. कक्षा पांचवीं से शुरू हुआ कबड्डी का सफर

संजू देवी ने अपने गांव के स्कूल में कक्षा पांचवीं से कबड्डी खेलना शुरू किया। ग्रामीण परिवेश में उपलब्ध सीमित खेल सुविधाओं के बीच उन्होंने खेल की बुनियादी समझ विकसित की। उनकी प्रतिभा पर बाद में कोरबा जिला कबड्डी संघ के कोच अनुज प्रताप सिंह की नजर पड़ी। उन्होंने संजू को प्रशिक्षण और मार्गदर्शन देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

यहीं से गांव की एक प्रतिभाशाली बच्ची के खेल जीवन को व्यवस्थित प्रशिक्षण का आधार मिला।

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3. गांव से कोरबा तक का सफर भी किसी परीक्षा से कम नहीं था

रिपोर्टों के अनुसार, शुरुआती दौर में संजू को प्रशिक्षण के लिए गांव से कोरबा तक आने-जाने में प्रतिदिन लंबा सफर करना पड़ता था। संसाधनों की कमी के बावजूद उन्होंने अभ्यास नहीं छोड़ा।

खेल की भाषा में इसे केवल यात्रा नहीं कहा जा सकता। यह उस मानसिक दृढ़ता का हिस्सा था, जिसने आगे चलकर उन्हें राष्ट्रीय टीम तक पहुंचाया।

जहां बहुत से खिलाड़ी सुविधाओं के अभाव को अपनी कमजोरी मान सकते हैं, वहीं संजू ने उपलब्ध परिस्थितियों में अभ्यास जारी रखा और धीरे-धीरे अपनी पहचान बनाई।

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4. प्रतिभा को मिला प्रशिक्षण का आधार

संजू की प्रतिभा को व्यवस्थित प्रशिक्षण मिलने के बाद उनके खेल में निरंतर सुधार हुआ। बाद में उनका चयन बहतराई बालिका आवासीय खेल अकादमी, बिलासपुर में हुआ, जहां उन्होंने प्रशिक्षण प्राप्त किया। वहां कोच दिल कुमार राठौड़ के मार्गदर्शन में उनकी रेडिंग क्षमता को और विकसित किया गया।

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कबड्डी में संजू की प्रमुख भूमिका रेडर की है। रेडर के लिए गति, संतुलन, निर्णय क्षमता, शरीर पर नियंत्रण और दबाव की स्थिति में तुरंत निर्णय लेने की क्षमता अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।

संजू ने इसी क्षेत्र में अपनी विशेष पहचान बनाई।

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5. जब खेल और आर्थिक संघर्ष आमने-सामने खड़े थे

संजू की कहानी का एक महत्वपूर्ण पहलू उनका आर्थिक संघर्ष भी है। रिपोर्टों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए विदेश यात्रा के शुरुआती दौर में परिवार के लिए आवश्यक खर्च जुटाना आसान नहीं था। बांग्लादेश जाने के लिए उन्हें ₹5,000 की राशि उधार लेकर यात्रा करनी पड़ी थी।

यह प्रसंग उनकी यात्रा की कठिनाइयों को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

आज जिस खिलाड़ी के नाम के साथ अंतरराष्ट्रीय स्वर्ण पदक जुड़ चुका है, उसके सफर में ऐसा समय भी रहा जब अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने के लिए छोटी-सी आर्थिक सहायता भी निर्णायक बन गई थी।

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6. नौकरी या खेल—निर्णायक मोड़ पर संजू ने चुना कबड्डी का रास्ता

रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 17 वर्ष की उम्र में संजू के सामने खेल को करियर के रूप में आगे बढ़ाने अथवा नौकरी की दिशा में जाने का विकल्प था। उन्होंने खेल को चुना।

यह निर्णय आगे चलकर उनके जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ।

खेल में करियर का रास्ता अनिश्चितताओं से भरा होता है। चयन की प्रतिस्पर्धा, प्रशिक्षण का दबाव और लगातार प्रदर्शन की आवश्यकता खिलाड़ी से निरंतर अनुशासन की मांग करती है। संजू ने इसी चुनौतीपूर्ण मार्ग को अपने करियर का आधार बनाया।

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7. 2025 महिला कबड्डी विश्व कप ने बदल दी पहचान

संजू देवी की अंतरराष्ट्रीय पहचान को मजबूती 2025 महिला कबड्डी विश्व कप में मिली, जहां उन्होंने भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व किया। भारत ने प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीता और रिपोर्टों के अनुसार संजू को टूर्नामेंट की MVP—Most Valuable Player भी चुना गया।

यह उपलब्धि एशियन गेम्स 2026 के स्वर्ण पदक से पहले उनके अंतरराष्ट्रीय खेल करियर की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी।

इससे स्पष्ट होता है कि उनका एशियन गेम्स तक पहुंचना अचानक हुई सफलता नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार प्रदर्शन की विकसित होती यात्रा का परिणाम था।

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8. एशियन गेम्स 2026—जब केराकछार की बेटी ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर तिरंगा ऊंचा किया

जापान के आइची-नागोया में आयोजित एशियन गेम्स 2026 के लिए भारतीय महिला कबड्डी टीम में संजू देवी को स्थान मिला। भारतीय टीम ने पूरे अभियान में प्रभावी प्रदर्शन करते हुए फाइनल में ईरान को पराजित किया और स्वर्ण पदक अपने नाम किया।

बांग्लादेश के खिलाफ भारत की जीत में संजू की सफल रेड का योगदान रहा। सेमीफाइनल में नेपाल के खिलाफ भी उन्होंने प्रभावी रेड के जरिए टीम की जीत में भूमिका निभाई।

फाइनल की जीत के साथ भारतीय महिला कबड्डी टीम ने स्वर्ण पदक हासिल किया और संजू देवी भी उस स्वर्णिम भारतीय टीम की सदस्य बनीं।

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9. मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने फोन कर दी बधाई

संजू देवी की उपलब्धि पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने उनसे फोन पर बातचीत कर बधाई एवं शुभकामनाएं दीं। मुख्यमंत्री ने उनकी प्रतिभा, कड़ी मेहनत और खेल कौशल की सराहना करते हुए कहा कि उनकी उपलब्धि से पूरा छत्तीसगढ़ गौरवान्वित है।

मुख्यमंत्री के अनुसार, संजू देवी ने न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे देश का नाम रोशन किया है और उनकी सफलता प्रदेश की बेटियों तथा युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा बनेगी। उन्होंने भारतीय महिला कबड्डी टीम के खिलाड़ियों, प्रशिक्षकों और सहयोगी स्टाफ को भी बधाई दी।

मुख्यमंत्री ने संजू से यह भी कहा कि वे आएं, उनका स्वागत किया जाएगा।

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10. मुख्यमंत्री के संदेश का व्यापक अर्थ

मुख्यमंत्री का संदेश केवल एक खिलाड़ी को बधाई देने तक सीमित नहीं है। इसमें ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे शहरों में मौजूद खेल प्रतिभाओं को अवसर देने पर भी जोर दिया गया है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ की बेटियां शिक्षा, खेल सहित विभिन्न क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा और सामर्थ्य का परिचय दे रही हैं। उन्होंने ग्रामीण, आदिवासी अंचलों और छोटे शहरों की प्रतिभाओं को बेहतर प्रशिक्षण, सुविधाएं और अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में सरकार के प्रयासों का उल्लेख किया।

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11. संजू की जीवनशैली—चमक से अधिक अनुशासन की कहानी

संजू देवी की सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जीवन-कथा से जिस जीवनशैली की तस्वीर सामने आती है, उसमें निरंतर अभ्यास, खेल अनुशासन, प्रशिक्षण, शारीरिक तैयारी और लक्ष्य पर केंद्रित जीवन प्रमुख हैं।

गांव के स्तर से राष्ट्रीय टीम और फिर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने वाले खिलाड़ी के लिए नियमित अभ्यास और फिटनेस प्रशिक्षण अनिवार्य होते हैं। संजू का खेल करियर भी इसी दीर्घकालिक प्रशिक्षण प्रक्रिया से विकसित हुआ है।

उनकी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि अंतरराष्ट्रीय पदक केवल प्रतियोगिता के दिन नहीं जीता जाता—उसके पीछे वर्षों की तैयारी होती है।

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12. शिक्षा को भी नहीं छोड़ा

संजू ने खेल के साथ अपनी शिक्षा भी जारी रखी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार उन्होंने शासकीय महाविद्यालय, कटघोरा से उच्च शिक्षा प्राप्त की तथा ITI की पढ़ाई भी पूरी की।

यह पहलू उनकी कहानी को और महत्वपूर्ण बनाता है।

खेल और शिक्षा को साथ लेकर चलना युवा खिलाड़ियों के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण है, क्योंकि खेल करियर के साथ शैक्षणिक आधार भविष्य के लिए अतिरिक्त अवसर उपलब्ध कराता है।

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13. केवल परिवार की नहीं, पूरे कोरबा की बेटी

संजू देवी की सफलता का प्रभाव उनके परिवार की सीमाओं से कहीं आगे जाता है।

केराकछार गांव से निकलकर राष्ट्रीय टीम तक पहुंचना और फिर एशियन गेम्स के स्वर्ण पदक विजेता दल का हिस्सा बनना कोरबा के खेल इतिहास के लिए उल्लेखनीय उपलब्धि है।

उनकी कहानी ग्रामीण क्षेत्रों में मौजूद उन अनगिनत प्रतिभाओं की ओर भी ध्यान आकर्षित करती है जिन्हें केवल बेहतर अवसर, प्रशिक्षण और मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है।

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14. जनजातीय पहचान के संबंध में जरूरी तथ्य

संजू देवी के संबंध में कुछ रिपोर्टें उन्हें ग्रामीण एवं आदिवासी अंचल की प्रतिभाओं के संदर्भ में प्रस्तुत करती हैं, लेकिन उपलब्ध आधिकारिक/विश्वसनीय सामग्री में उनकी किसी विशिष्ट जनजाति का स्पष्ट और प्रमाणित उल्लेख नहीं मिला है।

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इसलिए समाचार में किसी विशेष जनजाति का नाम बिना आधिकारिक पुष्टि के लिखना उचित नहीं होगा।

उनकी पहचान के संबंध में उपलब्ध पुष्ट तथ्य हैं—संजू देवी यादव, ग्राम केराकछार, पाली विकासखंड, जिला कोरबा, छत्तीसगढ़।

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15. स्वर्ण पदक से आगे की बड़ी कहानी

संजू देवी की उपलब्धि को केवल “गोल्ड मेडल जीतने” तक सीमित कर देखना उनकी यात्रा के व्यापक संदर्भ को छोटा कर देगा।

यह कहानी है—

गांव से राष्ट्रीय टीम तक पहुंचने की।
सीमित संसाधनों से अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने की।
परिवार की आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद खेल को करियर बनाने की।
कक्षा पांचवीं के मैदान से एशियन गेम्स के स्वर्ण मंच तक पहुंचने की।
और सबसे बढ़कर, यह कहानी है उस बेटी की जिसने अपने प्रदर्शन से भारत और छत्तीसगढ़ दोनों का नाम ऊंचा किया।

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16. आज केराकछार का नाम अंतरराष्ट्रीय खेल मानचित्र पर

कभी जिस गांव का नाम स्थानीय भौगोलिक पहचान तक सीमित था, आज उसी केराकछार का नाम अंतरराष्ट्रीय खेल उपलब्धि के साथ लिया जा रहा है।

संजू देवी की उपलब्धि ने गांव, पाली विकासखंड और कोरबा जिले की खेल प्रतिभाओं की ओर व्यापक ध्यान आकर्षित किया है।

उनका सफर यह बताता है कि खेल प्रतिभा केवल बड़े शहरों की खेल अकादमियों में पैदा नहीं होती। वह गांव की मिट्टी, स्कूल के मैदान और सीमित संसाधनों के बीच भी जन्म ले सकती है—जरूरत केवल उसे पहचानने, प्रशिक्षित करने और अवसर देने की है।

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17. संजू देवी—संघर्ष से स्वर्ण तक की पूरी यात्रा

केराकछार की बच्ची → कक्षा पांचवीं से कबड्डी → जिला स्तर का प्रशिक्षण → आवासीय खेल अकादमी → राष्ट्रीय टीम → 2025 विश्व कप स्वर्ण → MVP का सम्मान → एशियन गेम्स 2026 → भारत के लिए स्वर्ण पदक।

यह क्रम अपने आप में संजू देवी के खेल जीवन का संक्षिप्त परिचय है।

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18. अंतिम शब्द—यह पदक केवल एक खिलाड़ी का नहीं

संजू देवी के हाथ में आया स्वर्ण पदक केवल धातु का एक पदक नहीं है। यह वर्षों के अभ्यास, परिवार के सहयोग, प्रशिक्षकों के मार्गदर्शन और खिलाड़ी के अनुशासन का परिणाम है।

यह उन गांवों की बेटियों के लिए संदेश है जो खेलना चाहती हैं।

यह उन परिवारों के लिए संदेश है जो सीमित साधनों में अपने बच्चों के सपनों को बचाए रखते हैं।

यह उन प्रशिक्षकों के लिए संदेश है जो छोटे मैदानों में बड़ी प्रतिभाओं को पहचानते हैं।

और यह खेल व्यवस्था के लिए भी एक स्पष्ट संकेत है कि प्रतिभा देश के हर गांव में मौजूद हो सकती है; आवश्यकता केवल उसे खोजने, तराशने और अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने की है।

आज केराकछार की संजू देवी के नाम के साथ एशियन गेम्स का स्वर्ण पदक जुड़ चुका है।

गांव की मिट्टी से उठी यह बेटी अब उस भारतीय तिरंगे की स्वर्णिम कहानी का हिस्सा है, जिसे उसने अंतरराष्ट्रीय खेल मंच पर गर्व के साथ ऊंचा किया।

कोरबा की बेटी संजू देवी—संघर्ष से सफलता तक की ऐसी कहानी, जिसे आने वाली पीढ़ियां केवल पढ़ेंगी नहीं, बल्कि उससे प्रेरणा भी लेंगी।

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RAJIV RASTOGI NEWS NETWORK SERVICE

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