
जांजगीर-चांपा के बाजार में नकली सामानों का कथित कारोबार! ब्रांड के नाम पर उपभोक्ताओं से कितना बड़ा छल? जिम्मेदार विभागों की निगरानी पर उठे गंभीर सवाल
ब्रांडेड कपड़े, इलेक्ट्रिकल उपकरण, घरेलू बर्तन, खाद्य सामग्री और रोजमर्रा की जरूरतों के सामान की वास्तविक गुणवत्ता और प्रमाणिकता पर सवाल। जीएसटी बिल, निर्माता कंपनी, सप्लाई चेन, एमआरपी और गुणवत्ता मानकों की जांच आखिर कौन करेगा? आम जनता की मेहनत की कमाई से खिलवाड़ कब रुकेगा?
जिला जांजगीर-चांपा, छत्तीसगढ़।
बाजार किसी भी जिले की आर्थिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार होता है। यहां मजदूर से लेकर अधिकारी तक, किसान से लेकर व्यापारी तक और बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक अपनी जरूरतों का सामान खरीदने पहुंचते हैं। कोई अपने बच्चों के लिए कपड़े खरीदता है, कोई घर के लिए बर्तन, कोई बिजली से संबंधित उपकरण तो कोई परिवार की जरूरतों के लिए खाद्य सामग्री। प्रत्येक व्यक्ति अपनी मेहनत की कमाई खर्च करके यह उम्मीद करता है कि उसे जो सामान दिया जा रहा है, वह असली, सुरक्षित, गुणवत्तापूर्ण और निर्धारित मूल्य के अनुरूप होगा। लेकिन जांजगीर-चांपा जिले के बाजारों में नकली, डुप्लीकेट, संदिग्ध ब्रांडिंग और उत्पादों की गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। बाजार में उपलब्ध सामान की वास्तविक पहचान, निर्माता कंपनी, अधिकृत सप्लाई व्यवस्था, जीएसटी बिलिंग, गुणवत्ता प्रमाणन और मूल्य निर्धारण की निगरानी कितनी प्रभावी है, इसकी निष्पक्ष पड़ताल अब जरूरी दिखाई देती है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या जिले के उपभोक्ताओं को ब्रांड के नाम पर वास्तविक ब्रांडेड सामान मिल रहा है या कहीं कुछ मामलों में प्रसिद्ध कंपनियों के नाम, लोगो और पैकेजिंग का इस्तेमाल करके दूसरे उत्पादों की बिक्री तो नहीं की जा रही है? जांजगीर, चांपा, नैला सहित जिले के अलग-अलग व्यापारिक क्षेत्रों में कपड़ों, फुटवियर, इलेक्ट्रिकल पार्ट्स, घरेलू बर्तनों, उपकरणों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की प्रमाणिकता की जांच होनी चाहिए। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि संबंधित उत्पाद किस कंपनी द्वारा निर्मित हैं, उनके निर्माता और वितरक कौन हैं, क्या संबंधित कंपनियों की अधिकृत डीलरशिप उपलब्ध है और क्या उत्पादों पर आवश्यक गुणवत्ता मानकों का पालन किया जा रहा है।
ब्रांड के नाम पर कीमत असली और सामान की गुणवत्ता संदिग्ध हुई तो उपभोक्ता आखिर किसके पास जाएगा?
मामला केवल ब्रांडेड कपड़ों तक सीमित नहीं है। इलेक्ट्रिकल सामान की गुणवत्ता तो सीधे नागरिकों की सुरक्षा से जुड़ी हुई है। तार, स्विच, सॉकेट, एमसीबी, प्लग, चार्जर और अन्य बिजली संबंधी उपकरणों में घटिया गुणवत्ता अथवा नकली प्रमाणन का मामला सामने आता है तो इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं। ऐसे उत्पादों की जांच में निर्माता की पहचान, वैध प्रमाणन, जहां अनिवार्य हो वहां BIS लाइसेंस, उत्पाद की तकनीकी गुणवत्ता और वारंटी की वास्तविकता का परीक्षण होना चाहिए।
इसी तरह घरेलू बर्तनों में उपयोग की गई सामग्री, वास्तविक वजन, गुणवत्ता और निर्माता के विवरण की जांच भी आवश्यक है। खाद्य पदार्थों के मामले में तो और अधिक संवेदनशीलता जरूरी है। खाद्य तेल, मसाले, दूध से बने उत्पाद, पैकेज्ड खाद्य सामग्री और रोजाना इस्तेमाल होने वाले अन्य उत्पादों में मिलावट, गलत लेबलिंग, समाप्ति तिथि में छेड़छाड़ अथवा बिना आवश्यक लाइसेंस के कारोबार की आशंका को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। बच्चों के खिलौनों और उनकी दैनिक आवश्यकताओं से जुड़े उत्पादों की गुणवत्ता और सुरक्षा भी जांच के दायरे में होनी चाहिए।
आखिर आम नागरिक बाजार से सामान खरीद रहा है या अपनी मेहनत की कमाई देकर उत्पाद की वास्तविकता का जोखिम उठा रहा है?
जीएसटी और व्यापारिक लेन-देन की पारदर्शिता पर भी उठे सवाल
किसी दुकान में सामान बिकना अपने आप में उसकी वैधानिक प्रमाणिकता का प्रमाण नहीं है। इसी प्रकार जीएसटी बिल मिलना भी इस बात की गारंटी नहीं है कि उत्पाद वास्तविक ब्रांड का ही है। इसलिए बाजार में उपलब्ध संदिग्ध उत्पादों की खरीद-बिक्री से संबंधित इनवॉइस, सप्लायर का विवरण, स्टॉक रजिस्टर, जीएसटी पंजीयन और बिक्री रिकॉर्ड का नियमानुसार परीक्षण होना चाहिए।
जांच का विषय यह होना चाहिए कि संबंधित व्यापारी का जीएसटी पंजीयन आवश्यकतानुसार वैध है या नहीं, सामान किस निर्माता अथवा सप्लायर से खरीदा गया, खरीद और बिक्री के बिलों में समानता है या नहीं, वास्तविक स्टॉक और व्यापारिक रिकॉर्ड में कोई अंतर तो नहीं है तथा किसी दूसरे पंजीकृत व्यापारी के जीएसटी नंबर का अनुचित इस्तेमाल तो नहीं किया जा रहा है।
केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम, 2017 की धारा 122 में बिना वैध इनवॉइस बिक्री, गलत इनवॉइस, कर संग्रह और अन्य निर्धारित उल्लंघनों के लिए दंडात्मक प्रावधान हैं। प्रत्येक मामले में संबंधित अपराध के तत्व और वैधानिक परिस्थितियों के आधार पर कार्रवाई निर्धारित होती है।
कानून में हैं कड़े प्रावधान, फिर निगरानी कितनी प्रभावी?
भारत में उपभोक्ता अधिकारों, उत्पाद गुणवत्ता, खाद्य सुरक्षा, नापतौल और कर व्यवस्था को नियंत्रित करने के लिए अलग-अलग कानून लागू हैं। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 17 उपभोक्ता अधिकारों के उल्लंघन संबंधी शिकायतों से संबंधित है। धारा 21 भ्रामक विज्ञापनों पर कार्रवाई का प्रावधान करती है। धारा 89 के अंतर्गत झूठे या भ्रामक विज्ञापनों के लिए निर्माता अथवा सेवा प्रदाता को दोष सिद्ध होने पर दो वर्ष तक कारावास और दस लाख रुपये तक जुर्माना हो सकता है। पुनरावृत्ति पर दंड बढ़ सकता है।
BIS अधिनियम, 2016 की धारा 17 के अंतर्गत अनिवार्य मानक प्रमाणन वाले उत्पादों पर बिना वैध लाइसेंस मानक चिह्न का उपयोग प्रतिबंधित है। धारा 29 के अंतर्गत संबंधित उल्लंघनों पर दंड का प्रावधान है। Legal Metrology Act, 2009 की धारा 18 और 36 के अंतर्गत पैकेज्ड वस्तुओं की आवश्यक घोषणाओं और नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई की जा सकती है।
खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 की धारा 57 में मिलावट के लिए तथा धारा 59 में असुरक्षित खाद्य पदार्थों से संबंधित अपराधों के लिए दंड का प्रावधान है। अपराध की प्रकृति और उसके परिणाम के आधार पर कारावास और जुर्माने की सजा निर्धारित होती है।
इन कानूनों का उद्देश्य केवल कार्रवाई करना नहीं, बल्कि बाजार में उपभोक्ताओं के अधिकारों और सुरक्षा की रक्षा करना है।
आखिर जिम्मेदार विभाग कर क्या रहे हैं?
जिले के बाजारों की निगरानी किसी एक विभाग की जिम्मेदारी नहीं है। खाद्य एवं औषधि प्रशासन, राज्य जीएसटी विभाग, नापतौल विभाग, BIS के सक्षम अधिकारी, जिला प्रशासन और उपभोक्ता संरक्षण से जुड़े प्राधिकरणों की अपनी-अपनी वैधानिक जिम्मेदारियां हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि पिछले पांच वर्षों में जांजगीर-चांपा जिले के बाजारों में कितने नियमित निरीक्षण किए गए? कितनी दुकानों की जांच हुई? कितने उत्पादों के नमूने प्रयोगशालाओं में भेजे गए? कितने मामलों में नकली ब्रांडिंग, मिलावट, गलत वजन, गलत एमआरपी अथवा जीएसटी संबंधी अनियमितताएं प्रमाणित हुईं? कितने व्यापारियों पर जुर्माना लगाया गया? कितने मामलों में लाइसेंस निलंबित या निरस्त हुए और कितने प्रकरण न्यायालय तक पहुंचे?
क्या संबंधित अधिकारियों के पास इन सभी कार्रवाइयों का व्यवस्थित रिकॉर्ड उपलब्ध है? क्या शिकायत मिलने पर मौके पर पहुंचकर वास्तविक निरीक्षण किया जाता है या केवल कागजी जवाब देकर जिम्मेदारी पूरी कर ली जाती है? क्या पूर्व में कार्रवाई किए गए प्रतिष्ठानों का दोबारा निरीक्षण होता है? यदि किसी क्षेत्र में लगातार शिकायतें मिलती हैं तो वहां विशेष निगरानी क्यों नहीं की जाती?
यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि निरीक्षण के नाम पर तैयार की गई रिपोर्ट और बाजार की वास्तविक परिस्थितियों में कोई अंतर तो नहीं है। यदि किसी अधिकारी की जानबूझकर लापरवाही, कर्तव्य की उपेक्षा अथवा अनुचित संरक्षण के प्रमाण मिलते हैं तो उसकी जवाबदेही भी नियमानुसार तय होनी चाहिए। हालांकि बिना साक्ष्य किसी अधिकारी या व्यापारी पर मिलीभगत, भ्रष्टाचार अथवा कमीशनखोरी का आरोप लगाना उचित नहीं होगा।
नकली सामान का कारोबार केवल उपभोक्ता नहीं, पूरी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है
इस समस्या का आर्थिक प्रभाव कई स्तरों पर पड़ सकता है। कोई व्यक्ति किसी प्रसिद्ध कंपनी का उत्पाद समझकर अधिक कीमत चुकाता है, लेकिन बाद में वह उत्पाद घटिया या नकली निकलता है तो उसकी सीधी आर्थिक हानि होती है। उत्पाद जल्दी खराब होने पर उसे दोबारा सामान खरीदना पड़ता है। वारंटी और सर्विस का लाभ नहीं मिल पाता। इलेक्ट्रिकल सामान में सुरक्षा संबंधी खतरे पैदा हो सकते हैं और खाद्य पदार्थों में मिलावट से स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है।
दूसरी तरफ वैध पंजीयन, कर भुगतान और अधिकृत सप्लाई व्यवस्था के माध्यम से कारोबार करने वाले व्यापारियों के सामने असमान प्रतिस्पर्धा की स्थिति बन सकती है। यदि कोई व्यक्ति कम गुणवत्ता वाले अथवा नकली ब्रांडेड उत्पादों को कम लागत पर बेचता है तो नियमों का पालन करने वाले व्यापारी प्रभावित होते हैं। इस प्रकार उपभोक्ता का नुकसान, वास्तविक कंपनियों के ब्रांड की प्रतिष्ठा को नुकसान और सरकारी राजस्व पर संभावित प्रभाव—तीनों विषय एक-दूसरे से जुड़े हैं।
प्रशासन को कराना चाहिए जिले के बाजारों का विशेष सर्वेक्षण
जांजगीर-चांपा जिले के नागरिकों के हित में जिला प्रशासन के समन्वय से संबंधित विभागों द्वारा एक व्यवस्थित और निष्पक्ष बाजार सर्वेक्षण कराया जाना चाहिए। इसमें जांजगीर, चांपा, नैला सहित प्रमुख शहरी और ग्रामीण व्यापारिक क्षेत्रों को शामिल किया जाए। कपड़े, फुटवियर, इलेक्ट्रिकल उपकरण, घरेलू बर्तन, खाद्य पदार्थ और अन्य आवश्यक वस्तुओं की अलग-अलग श्रेणियों में जांच हो।
संदिग्ध उत्पादों की खरीद के बिल, निर्माता, सप्लायर और अधिकृत वितरण व्यवस्था का सत्यापन किया जाए। जहां आवश्यक हो वहां उत्पादों के नमूने लेकर मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं में परीक्षण कराया जाए। खाद्य पदार्थों के लिए खाद्य सुरक्षा अधिकारियों द्वारा नियमानुसार सैंपलिंग की जाए। पैकेज्ड वस्तुओं पर निर्माता, पैकर, एमआरपी, मात्रा और अन्य आवश्यक घोषणाओं की जांच हो। जीएसटी विभाग अपने अधिकार क्षेत्र में बिलिंग, स्टॉक और कर संबंधी रिकॉर्ड का परीक्षण करे। नापतौल विभाग वजन और माप संबंधी शिकायतों पर कार्रवाई करे।
साथ ही पिछले पांच वर्षों के निरीक्षण, प्राप्त शिकायतों, कार्रवाई, जब्ती, जुर्माने, लंबित मामलों और न्यायिक प्रकरणों की समीक्षा करके एक समेकित रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी चाहिए। इससे यह स्पष्ट होगा कि बाजार में वास्तविक स्थिति क्या है और विभागीय निगरानी कितनी प्रभावी रही है।
जनता के कुछ सवाल, जिनका जवाब प्रशासन को देना चाहिए
क्या जांजगीर-चांपा जिले में नकली और डुप्लीकेट उत्पादों की पहचान के लिए नियमित निगरानी व्यवस्था है? क्या बाजारों में अचानक निरीक्षण किया जाता है? क्या ब्रांडेड उत्पादों की अधिकृत सप्लाई चेन की जांच होती है? पिछले पांच वर्षों में कितनी दुकानों पर कार्रवाई हुई? कितने खाद्य नमूने जांच के लिए भेजे गए? कितने मामलों में मिलावट प्रमाणित हुई? कितने इलेक्ट्रिकल उत्पादों में अनिवार्य सुरक्षा मानकों का उल्लंघन पाया गया? बिना बिल बिक्री और जीएसटी संबंधी अनियमितताओं पर कितनी कार्रवाई हुई? क्या उपभोक्ताओं की शिकायतों का समयबद्ध निराकरण किया जाता है? जिन मामलों में कार्रवाई नहीं हुई, उनके लंबित रहने का कारण क्या है?
ये केवल सवाल नहीं हैं, बल्कि उपभोक्ता हितों और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़े महत्वपूर्ण विषय हैं।
उपभोक्ता की मेहनत की कमाई कोई प्रयोगशाला नहीं!
एक मजदूर दिनभर मेहनत करता है, एक किसान अपनी फसल बेचकर परिवार की जरूरतें पूरी करता है, एक कर्मचारी महीनेभर काम करके वेतन पाता है और एक छोटा व्यापारी अपनी पूंजी लगाकर जीवन चलाता है। इन सभी की कमाई का एक बड़ा हिस्सा बाजार में खर्च होता है। जब कोई व्यक्ति किसी ब्रांडेड वस्तु के लिए अधिक कीमत चुकाता है तो वह उस ब्रांड की गुणवत्ता और विश्वसनीयता पर भी भरोसा करता है।
यदि इसी विश्वास का फायदा उठाकर किसी उपभोक्ता को नकली उत्पाद बेचा जाता है तो यह उसके अधिकारों पर चोट है। उसे यह जानने का अधिकार है कि सामान किसने बनाया, कहां बनाया, किस गुणवत्ता मानक के अनुरूप है, उसकी वास्तविक कीमत क्या है और उसे मिलने वाली वारंटी कितनी विश्वसनीय है।
आखिर आम नागरिक को असली सामान खरीदने के लिए भी असली व्यवस्था की जरूरत क्यों पड़ रही है?
जांजगीर-चांपा के बाजारों में नकली, डुप्लीकेट और संदिग्ध उत्पादों की बिक्री को लेकर उठ रहे सवालों की निष्पक्ष जांच अब आवश्यक है। किसी व्यापारी विशेष को निशाना बनाना इस खबर का उद्देश्य नहीं है। उद्देश्य है उपभोक्ता के अधिकारों की रक्षा, ईमानदार व्यापारियों का संरक्षण और वैध व्यापारिक व्यवस्था को मजबूत करना।
यदि जांच में किसी व्यापारी द्वारा नकली ब्रांडिंग, मिलावट, गलत बिलिंग अथवा अन्य वैधानिक उल्लंघन प्रमाणित होते हैं तो उसके विरुद्ध कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। इसी प्रकार यदि किसी अधिकारी की जिम्मेदारी में लापरवाही प्रमाणित होती है तो उसकी जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए।
बाजार में बिकने वाला सामान केवल एक वस्तु नहीं, बल्कि जनता के विश्वास का विषय है। ब्रांड के नाम पर धोखा, गुणवत्ता के नाम पर समझौता और उपभोक्ता सुरक्षा के साथ खिलवाड़ किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
अब सवाल सीधा है—जांजगीर-चांपा के बाजारों में उपभोक्ताओं को असली सामान और उचित मूल्य का भरोसा कौन दिलाएगा? और जिम्मेदार विभाग अपनी निगरानी व्यवस्था का हिसाब जनता के सामने कब रखेंगे?
जनता को केवल बाजार नहीं चाहिए, जनता को सुरक्षित, पारदर्शी और भरोसेमंद बाजार चाहिए।



