
अंतरिक्ष में भारत की ऐतिहासिक उड़ान: ISRO ने रात 11:51 बजे लॉन्च किया GSLV-F18, NVS-03 उपग्रह से स्वदेशी NavIC प्रणाली को मिलेगी नई शक्ति
श्रीहरिकोटा | 31 अक्टूबर 2026 | Media House MPCG
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने एक बार फिर अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारत की बढ़ती तकनीकी क्षमता का प्रदर्शन किया है। 30 अक्टूबर 2026 की देर रात 11 बजकर 51 मिनट पर आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से GSLV-F18 प्रक्षेपण यान ने NVS-03 नेविगेशन उपग्रह के साथ सफलतापूर्वक उड़ान भरी। यह मिशन भारत की स्वदेशी उपग्रह आधारित नेविगेशन प्रणाली NavIC को और अधिक सक्षम बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
इस मिशन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि भारत ने अपनी स्वतंत्र नेविगेशन क्षमता को मजबूत करने के लिए नई पीढ़ी के उपग्रह को अंतरिक्ष में स्थापित किया है। इसमें स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक तकनीक के साथ आधुनिक नेविगेशन सिग्नल प्रणाली को शामिल किया गया है। इसका प्रभाव केवल अंतरिक्ष अनुसंधान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाले समय में परिवहन, समुद्री नौवहन, डिजिटल लोकेशन सेवाओं, आपदा प्रबंधन और राष्ट्रीय तकनीकी आत्मनिर्भरता के क्षेत्रों में भी दिखाई दे सकता है।
1. रात 11:51 बजे श्रीहरिकोटा से हुआ ऐतिहासिक प्रक्षेपण
ISRO का यह प्रक्षेपण शुक्रवार, 30 अक्टूबर की रात किया गया। निर्धारित समय के अनुसार रात 11:51 बजे GSLV-F18 ने सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के द्वितीय प्रक्षेपण पैड से उड़ान भरी।
रात के अंधकार में प्रक्षेपण यान के इंजन सक्रिय होने के साथ ही विशाल अग्निशिखा और धुएं का गुबार दिखाई दिया। कुछ ही क्षणों में रॉकेट धरती की सतह से ऊपर उठते हुए वायुमंडल की ओर तेजी से बढ़ने लगा।
इस मिशन का प्रमुख उद्देश्य 2,232 किलोग्राम वजनी NVS-03 उपग्रह को जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (GTO) में स्थापित करना था। ISRO के आधिकारिक मिशन विवरण में उपग्रह को निर्धारित कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित किए जाने की पुष्टि की गई है।
यह मिशन भारत की नेविगेशन उपग्रह श्रृंखला के विस्तार और मौजूदा सेवाओं की निरंतरता के लिहाज से विशेष महत्व रखता है।
2. GSLV-F18 रॉकेट की तकनीकी क्षमता
इस मिशन में इस्तेमाल किया गया GSLV-F18 भारत के भू-तुल्यकालिक उपग्रह प्रक्षेपण यान GSLV की 20वीं उड़ान है।
इस प्रक्षेपण यान की प्रमुख तकनीकी विशेषताएं इस प्रकार हैं:
– प्रक्षेपण यान की ऊंचाई लगभग 50 मीटर।
– प्रक्षेपण के समय कुल भार लगभग 420 टन।
– तीन चरणों वाला प्रक्षेपण यान।
– ठोस, तरल और क्रायोजेनिक प्रणोदन तकनीक का इस्तेमाल।
– उपग्रह का भार लगभग 2,232 किलोग्राम।
– निर्धारित गंतव्य कक्षा जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट।
GSLV की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में इसका क्रायोजेनिक ऊपरी चरण शामिल है। क्रायोजेनिक इंजन में अत्यंत कम तापमान पर रखे गए तरल ऑक्सीजन और तरल हाइड्रोजन का उपयोग किया जाता है।
यह तकनीक ऊंची ऊर्जा और प्रभावी प्रणोदन उपलब्ध कराने में सक्षम है। भारी उपग्रहों को अपेक्षाकृत ऊंची कक्षाओं की ओर भेजने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
रॉकेट के विभिन्न चरणों का संचालन अत्यंत सटीक समय निर्धारण, प्रणोदन नियंत्रण और उड़ान मार्गदर्शन प्रणाली के समन्वय पर निर्भर करता है।
3. आखिर क्या है NVS-03 उपग्रह?
NVS-03 भारत की दूसरी पीढ़ी की नेविगेशन उपग्रह श्रृंखला का तीसरा उपग्रह है।
इसका विकास भारतीय क्षेत्रीय नेविगेशन उपग्रह प्रणाली (IRNSS), जिसे वर्तमान में NavIC के नाम से जाना जाता है, की सेवाओं की निरंतरता और क्षमता को मजबूत करने के उद्देश्य से किया गया है।
साधारण भाषा में समझें तो यह उपग्रह अंतरिक्ष से पृथ्वी पर मौजूद रिसीवरों को नेविगेशन और समय संबंधी संकेत उपलब्ध कराने वाली प्रणाली का हिस्सा है।
उपग्रह से प्राप्त संकेतों के आधार पर जमीन पर मौजूद उपकरण अपनी स्थिति, दूरी और समय की गणना कर सकते हैं।
NVS-03 का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह भारत की स्वतंत्र नेविगेशन प्रणाली के लिए आवश्यक उपग्रह नेटवर्क को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
4. GPS के अलावा भारत की अपनी NavIC प्रणाली क्यों जरूरी?
आज मोबाइल फोन, वाहन, विमान, जहाज और अनेक डिजिटल उपकरणों में लोकेशन निर्धारित करने के लिए उपग्रह आधारित नेविगेशन तकनीक का उपयोग होता है।
दुनिया में कई प्रमुख नेविगेशन प्रणालियां मौजूद हैं।
– GPS – अमेरिका की प्रणाली।
– GLONASS – रूस की प्रणाली।
– Galileo – यूरोपीय संघ की प्रणाली।
– BeiDou – चीन की प्रणाली।
– NavIC – भारत की स्वदेशी क्षेत्रीय प्रणाली।
भारत की NavIC प्रणाली का उद्देश्य देश और आसपास के क्षेत्र में स्वतंत्र नेविगेशन सेवाएं उपलब्ध कराना है।
GPS की तरह NavIC भी उपग्रहों के माध्यम से स्थिति निर्धारण और समय संबंधी सेवाएं प्रदान करती है। हालांकि इसकी भौगोलिक कवरेज और तकनीकी संरचना अलग है।
NavIC की नियोजित कवरेज में भारत का संपूर्ण भूभाग तथा भारत की भौगोलिक सीमा के आसपास लगभग 1,500 किलोमीटर तक का क्षेत्र शामिल है।
इसका अर्थ है कि भारत अपनी क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप स्वतंत्र उपग्रह आधारित नेविगेशन क्षमता विकसित कर रहा है।
5. स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक: मिशन की सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी उपलब्धियों में से एक
NVS-03 की प्रमुख विशेषताओं में स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक का समावेश है।
नेविगेशन उपग्रहों के लिए समय की सटीकता अत्यंत आवश्यक होती है। इसका कारण यह है कि उपग्रह से भेजे गए रेडियो सिग्नल को पृथ्वी पर मौजूद रिसीवर तक पहुंचने में कुछ समय लगता है।
रिसीवर इस समय अंतर के आधार पर उपग्रह से अपनी दूरी का अनुमान लगाता है। एक से अधिक उपग्रहों से प्राप्त संकेतों का विश्लेषण करके उसकी भौगोलिक स्थिति निर्धारित की जाती है।
इस पूरी प्रक्रिया में समय मापन की छोटी-सी त्रुटि भी स्थिति निर्धारण को प्रभावित कर सकती है।
एटॉमिक क्लॉक अत्यंत सटीक समय मापन के लिए विकसित की जाती है। NVS-03 में स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक के साथ अन्य प्राप्त एटॉमिक क्लॉक भी शामिल की गई हैं।
यह भारत की वैज्ञानिक अनुसंधान क्षमता और महत्वपूर्ण अंतरिक्ष तकनीकों में आत्मनिर्भरता की दिशा में उल्लेखनीय कदम है।
6. L1, L5 और S-बैंड तकनीक क्या है?
NVS-03 में आधुनिक नेविगेशन सिग्नल तकनीक का इस्तेमाल किया गया है।
इस उपग्रह की प्रमुख विशेषताओं में पहले से इस्तेमाल किए जा रहे L5 और S-बैंड संकेतों के अतिरिक्त L1 सिग्नल को शामिल करना है।
इनकी उपयोगिता को सरल तरीके से समझा जा सकता है।
L1 सिग्नल: यह नेविगेशन क्षेत्र में व्यापक रूप से उपयोग किया जाने वाला फ्रीक्वेंसी बैंड है। इसे शामिल करने से NavIC की आधुनिक उपभोक्ता उपकरणों के साथ अनुकूलता बढ़ाने की संभावना है।
L5 सिग्नल: यह नेविगेशन सेवाओं में उपयोग किया जाने वाला महत्वपूर्ण सिग्नल है। इसका उपयोग सटीक स्थिति निर्धारण और विभिन्न तकनीकी अनुप्रयोगों में किया जाता है।
S-बैंड सिग्नल: यह भी NavIC की सिग्नल संरचना का हिस्सा है और इसकी सेवाओं को संचालित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
इन अलग-अलग सिग्नल बैंड का उपयोग नेविगेशन रिसीवर की तकनीकी क्षमता और उपलब्ध सेवाओं के अनुसार किया जाता है।
7. भारत के आम नागरिकों को क्या फायदा मिल सकता है?
अंतरिक्ष में भेजे गए उपग्रहों का वास्तविक महत्व तब सामने आता है, जब उनकी तकनीक धरती पर आम नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाने में योगदान देती है।
NVS-03 से मजबूत होने वाली NavIC प्रणाली के संभावित उपयोग कई क्षेत्रों में हैं।
वाहन परिवहन: वाहनों की स्थिति जानने, मार्ग निर्धारण और परिवहन प्रबंधन में उपग्रह आधारित नेविगेशन उपयोगी है।
रेलवे: रेलवे संचालन, परिसंपत्तियों की निगरानी और समय समन्वय जैसी गतिविधियों में सटीक स्थिति एवं समय संबंधी सेवाएं उपयोगी हो सकती हैं।
समुद्री परिवहन: जहाजों और मछुआरों के लिए समुद्री क्षेत्र में दिशा और स्थिति निर्धारण महत्वपूर्ण है।
विमानन: विमानन क्षेत्र में नेविगेशन और समय समन्वय के लिए उपग्रह आधारित प्रणालियों का उपयोग किया जाता है।
आपदा प्रबंधन: बाढ़, चक्रवात और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के दौरान राहत एवं बचाव कार्यों में लोकेशन संबंधी जानकारी महत्वपूर्ण हो सकती है।
कृषि: आधुनिक कृषि उपकरणों, स्थान आधारित कृषि सेवाओं और सटीक कृषि प्रबंधन में नेविगेशन तकनीक की उपयोगिता है।
हालांकि इन सभी क्षेत्रों में उपयोग के लिए संबंधित उपकरणों और सेवाओं का NavIC के अनुकूल होना आवश्यक है।
8. भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह मिशन?
आधुनिक समय में उपग्रह आधारित नेविगेशन केवल नागरिक सुविधा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय रणनीतिक क्षमता का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।
रक्षा, समुद्री सुरक्षा, परिवहन निगरानी और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे के संचालन में सटीक स्थिति और समय संबंधी जानकारी की आवश्यकता होती है।
किसी देश के पास अपनी स्वतंत्र नेविगेशन प्रणाली होने से वह अपनी क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप तकनीकी सेवाओं का विकास कर सकता है।
NavIC की एक महत्वपूर्ण विशेषता इसकी दो प्रकार की सेवाएं हैं:
– Standard Positioning Service (SPS): सामान्य और नागरिक उपयोग के लिए।
– Restricted Service (RS): अधिकृत उपयोगकर्ताओं के लिए प्रतिबंधित सेवा।
इस तरह NavIC केवल आम नागरिकों के लिए लोकेशन सुविधा उपलब्ध कराने वाली प्रणाली नहीं है, बल्कि भारत की व्यापक तकनीकी और रणनीतिक संरचना का भी हिस्सा है।
9. NVS-02 की तकनीकी समस्या के बाद NVS-03 पर विशेष निगाहें
NVS-03 मिशन को समझने के लिए इसके पूर्ववर्ती उपग्रह NVS-02 की घटना का उल्लेख भी आवश्यक है।
29 जनवरी 2025 को GSLV-F15 के माध्यम से NVS-02 का प्रक्षेपण किया गया था। उपग्रह को प्रारंभिक कक्षा में स्थापित किया गया, लेकिन बाद में कक्षा बढ़ाने की प्रक्रिया के दौरान प्रणोदन प्रणाली से जुड़ी तकनीकी समस्या सामने आई।
इस कारण उपग्रह को उसकी निर्धारित परिचालन कक्षा तक पहुंचाने में कठिनाई हुई और वह नियमित नेविगेशन सेवाओं के लिए परिचालित नहीं हो सका।
इस घटना के बाद अंतरिक्ष वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों के लिए उपग्रह की प्रणोदन प्रणाली तथा संबंधित नियंत्रण प्रक्रियाओं का अध्ययन महत्वपूर्ण हो गया।
NVS-03 मिशन के संदर्भ में ISRO ने आवश्यक तकनीकी सुधारों और प्रक्रियागत उपायों पर काम किया।
इसलिए इस प्रक्षेपण को NavIC प्रणाली की निरंतरता के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
10. GTO कक्षा क्या होती है और उपग्रह को इसमें क्यों स्थापित किया जाता है?
NVS-03 को जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट यानी GTO में स्थापित किया गया है।
इस तकनीकी शब्द को समझना जरूरी है।
GTO एक प्रारंभिक स्थानांतरण कक्षा होती है। इसका उपयोग उपग्रह को उसकी आगे की निर्धारित कक्षा तक पहुंचाने की प्रक्रिया में किया जाता है।
उपग्रह सीधे अपनी अंतिम परिचालन स्थिति में पहुंच जाए, यह हर मिशन में आवश्यक नहीं होता। कई अभियानों में रॉकेट उपग्रह को प्रारंभिक कक्षा में स्थापित करता है और उसके बाद उपग्रह की अपनी प्रणोदन प्रणाली के माध्यम से कक्षा में आवश्यक परिवर्तन किए जाते हैं।
इसलिए GTO में सफल स्थापना और अंतिम परिचालन कक्षा में पहुंचना दो अलग-अलग चरण हैं।
NVS-03 के मामले में भी उपग्रह की आगे की कक्षीय प्रक्रियाओं, प्रणालियों की जांच और कमीशनिंग के बाद ही इसकी नियमित परिचालन स्थिति का आकलन किया जा सकेगा।
11. अंतरिक्ष मिशन में ग्राउंड स्टेशन और वैज्ञानिकों की भूमिका
किसी भी उपग्रह का प्रक्षेपण केवल रॉकेट उड़ाने तक सीमित नहीं होता। इसके पीछे वैज्ञानिकों, अंतरिक्ष इंजीनियरों, नियंत्रण विशेषज्ञों और ग्राउंड स्टेशन की एक व्यापक व्यवस्था काम करती है।
प्रक्षेपण के बाद उपग्रह के साथ संपर्क बनाए रखना अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।
इसके लिए टेलीमेट्री, ट्रैकिंग और कमांड सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है।
टेलीमेट्री: उपग्रह की स्थिति, तापमान, ऊर्जा और विभिन्न प्रणालियों से संबंधित जानकारी प्राप्त करने में मदद करती है।
ट्रैकिंग: उपग्रह की कक्षा और गति की निगरानी करती है।
कमांड सिस्टम: आवश्यक निर्देश उपग्रह तक पहुंचाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
इन प्रणालियों के समन्वय से वैज्ञानिक यह पता लगाते हैं कि उपग्रह की विभिन्न प्रणालियां सामान्य रूप से काम कर रही हैं या नहीं।
यह प्रक्रिया उपग्रह को नियमित सेवा में शामिल करने से पहले अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।
12. भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में GSLV-F18 की जगह
भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम पिछले कई दशकों में लगातार विकसित हुआ है।
आर्यभट्ट उपग्रह से शुरू हुई यात्रा आज चंद्रयान, मंगलयान, आदित्य-L1 और विभिन्न संचार एवं नेविगेशन उपग्रह अभियानों तक पहुंच चुकी है।
ISRO ने विभिन्न प्रकार के प्रक्षेपण यानों का विकास किया है।
PSLV को पृथ्वी की निचली और सूर्य-समकालिक कक्षाओं में उपग्रह स्थापित करने के लिए व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाता है।
GSLV का उपयोग अपेक्षाकृत भारी उपग्रहों को उच्च कक्षाओं की ओर भेजने के लिए किया जाता है।
LVM3 भारत के भारी प्रक्षेपण यानों में शामिल है और इसके माध्यम से बड़े अंतरिक्ष अभियानों को संचालित किया जाता है।
GSLV-F18 का महत्व इसलिए भी है क्योंकि यह GSLV की 20वीं उड़ान है और इसके माध्यम से भारत ने अपनी दूसरी पीढ़ी के नेविगेशन उपग्रह नेटवर्क को आगे बढ़ाया है।
13. NavIC और भविष्य की डिजिटल अर्थव्यवस्था
आने वाले समय में डिजिटल सेवाओं की दुनिया में लोकेशन और सटीक समय की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होने वाली है।
बैंकिंग नेटवर्क, दूरसंचार, परिवहन, लॉजिस्टिक्स, स्मार्ट सिटी और इंटरनेट आधारित अनेक सेवाएं सटीक समय एवं स्थान संबंधी जानकारी पर निर्भर करती हैं।
नेविगेशन प्रणाली के माध्यम से उपलब्ध जानकारी कई प्रकार की डिजिटल सेवाओं को अधिक प्रभावी बनाने में मदद कर सकती है।
भारत में स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली के विस्तार से घरेलू तकनीकी उद्योगों के लिए भी नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
विशेष रूप से ऐसे रिसीवर, चिपसेट और उपकरण विकसित करने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं, जो भारतीय नेविगेशन प्रणाली के संकेतों को प्राप्त करने में सक्षम हों।
इसका अर्थ यह है कि अंतरिक्ष में स्थापित एक उपग्रह का महत्व केवल उसकी कक्षा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका प्रभाव धरती पर विकसित होने वाली तकनीकी अर्थव्यवस्था तक पहुंच सकता है।
14. भारत के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की मेहनत का परिणाम
किसी अंतरिक्ष मिशन की सफलता के पीछे वर्षों का अनुसंधान, परीक्षण और तकनीकी तैयारी होती है।
रॉकेट की संरचना, ईंधन प्रणाली, इंजन का प्रदर्शन, नेविगेशन कंप्यूटर, उड़ान नियंत्रण और उपग्रह का निर्माण अलग-अलग विशेषज्ञ टीमों के समन्वय से पूरा होता है।
अंतरिक्ष अभियानों में अत्यंत छोटी तकनीकी त्रुटि भी पूरे मिशन को प्रभावित कर सकती है।
इसलिए प्रत्येक चरण का परीक्षण और गुणवत्ता नियंत्रण आवश्यक होता है।
NVS-03 मिशन में भी प्रक्षेपण यान से लेकर उपग्रह की नेविगेशन तकनीक तक कई जटिल वैज्ञानिक प्रणालियों का समन्वय देखने को मिला।
यह उपलब्धि भारत के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और अनुसंधान संस्थानों की तकनीकी क्षमता को रेखांकित करती है।
15. आने वाले समय में NavIC का भविष्य क्या होगा?
भारत की दूसरी पीढ़ी की नेविगेशन उपग्रह श्रृंखला का उद्देश्य मौजूदा सेवाओं की निरंतरता बनाए रखना और तकनीकी क्षमताओं को बेहतर करना है।
NVS-03 इस श्रृंखला का तीसरा उपग्रह है।
आगे NVS-04 और NVS-05 जैसे उपग्रहों का विकास और प्रक्षेपण भी इस व्यापक कार्यक्रम का हिस्सा है।
इस पूरी श्रृंखला का उद्देश्य एक ऐसी नेविगेशन प्रणाली विकसित करना है, जो भारत की क्षेत्रीय आवश्यकताओं को लंबे समय तक पूरा कर सके।
इस दिशा में उपग्रहों की संख्या, उनकी परिचालन स्थिति, सिग्नल की उपलब्धता, ग्राउंड इंफ्रास्ट्रक्चर और उपयोगकर्ता उपकरणों की अनुकूलता सभी महत्वपूर्ण होंगे।
इसलिए NVS-03 का प्रक्षेपण एक महत्वपूर्ण उपलब्धि जरूर है, लेकिन NavIC की दीर्घकालीन मजबूती एक व्यापक और निरंतर वैज्ञानिक कार्यक्रम पर निर्भर करेगी।
निष्कर्ष: अंतरिक्ष में बढ़ती भारत की ताकत, आत्मनिर्भर तकनीक की ओर निर्णायक कदम
GSLV-F18 के माध्यम से NVS-03 का सफल प्रक्षेपण भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।
इस मिशन ने यह स्पष्ट किया है कि भारत केवल उपग्रहों का प्रक्षेपण करने तक सीमित नहीं है, बल्कि अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप आधुनिक नेविगेशन तकनीक, स्वदेशी उपकरण और स्वतंत्र अंतरिक्ष आधारित सेवाओं के विकास पर भी निरंतर काम कर रहा है।
स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक, L1 सिग्नल और NavIC प्रणाली की निरंतरता जैसे पहलू इस मिशन को तकनीकी रूप से महत्वपूर्ण बनाते हैं।
आने वाले समय में जब डिजिटल अर्थव्यवस्था, परिवहन, संचार और राष्ट्रीय सुरक्षा में सटीक लोकेशन एवं समय संबंधी जानकारी की भूमिका और अधिक बढ़ेगी, तब ऐसी स्वदेशी प्रणालियों का महत्व भी बढ़ेगा।
श्रीहरिकोटा से रात 11 बजकर 51 मिनट पर अंतरिक्ष की ओर रवाना हुआ GSLV-F18 भारत की वैज्ञानिक प्रगति और तकनीकी आत्मनिर्भरता की यात्रा में एक और महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ गया है।
भारत अब अंतरिक्ष में केवल अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करा रहा, बल्कि अपनी जरूरतों के अनुरूप स्वतंत्र तकनीकी व्यवस्था विकसित करने की दिशा में भी लगातार आगे बढ़ रहा है।
Media House MPCG | विज्ञान, अंतरिक्ष एवं प्रौद्योगिकी विशेष रिपोर्ट



