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25 लाख की लाइब्रेरी या कागजों का खेल? जांजगीर-चांपा के कस्तूरबा विद्यालयों में उठे बड़े सवाल, RTI में नहीं मिले सीधे जवाब!

EXCLUSIVE INVESTIGATION | दस्तावेज़ों ने खड़े किए कई गंभीर प्रश्न

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जांजगीर-चांपा। जिले के विभिन्न कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालयों में पुस्तकालय स्थापना के नाम पर स्वीकृत लगभग ₹25.30 लाख की राशि अब गंभीर सवालों के घेरे में है। प्रशासनिक स्वीकृति से जुड़े दस्तावेज़ सामने आने के बाद यह मामला केवल पुस्तकालय निर्माण या पुस्तक क्रय तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि पारदर्शिता, जवाबदेही और सार्वजनिक धन के उपयोग पर भी बड़े प्रश्न खड़े कर रहा है।

सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जब संबंधित अभिलेखों, भुगतान विवरणों, क्रय प्रक्रिया, स्टॉक रजिस्टर, पुस्तकों की सूची और कार्य निष्पादन से जुड़ी जानकारी सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मांगी गई, तब आवेदकों को कथित रूप से स्पष्ट एवं पूर्ण जानकारी समय पर उपलब्ध नहीं कराई गई।

⚡ “दस्तावेज़ कुछ और कहते हैं, जवाब कुछ और” – आखिर छिपाया क्या जा रहा है?

उपलब्ध प्रशासनिक स्वीकृति दस्तावेज़ के अनुसार जिले के पांच कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालयों में पुस्तकालय स्थापना कार्य के लिए लगभग ₹25.30 लाख की राशि स्वीकृत की गई थी।

दस्तावेज़ों के अनुसार प्रत्येक विद्यालय के लिए लगभग ₹5.06 लाख का प्रावधान दिखाई देता है।

अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि—

✔️ पुस्तकालय वास्तव में स्थापित हुए या नहीं?

✔️ यदि स्थापित हुए तो उनमें कितनी पुस्तकें हैं?

✔️ पुस्तकों की खरीद किस प्रक्रिया से हुई?

✔️ भुगतान किन एजेंसियों या विक्रेताओं को किया गया?

✔️ क्या बाजार मूल्य और भुगतान मूल्य में अंतर था?

✔️ क्या विद्यालयों में आज भी वह सामग्री उपलब्ध है?

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🔍 RTI में गोलमोल जवाबों ने बढ़ाया संदेह

सूचना के अधिकार अधिनियम का मूल उद्देश्य सरकारी कार्यों में पारदर्शिता सुनिश्चित करना है।

लेकिन आवेदकों का आरोप है कि संबंधित कार्यालयों से मांगी गई जानकारी समय पर उपलब्ध नहीं कराई गई, कई मामलों में अपूर्ण जानकारी दी गई तथा कुछ मामलों में ऐसे उत्तर दिए गए जिनसे मूल रिकॉर्ड तक पहुंचना कठिन हो गया।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कोई कार्य पूर्णतः नियमसम्मत एवं पारदर्शी तरीके से किया गया है तो उससे संबंधित रिकॉर्ड उपलब्ध कराने में सामान्यतः कठिनाई नहीं होनी चाहिए।

🚨 सबसे बड़ा सवाल: क्या वास्तव में बने पुस्तकालय?

जांच का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि जिन विद्यालयों के नाम पर राशि स्वीकृत हुई—

क्या वहां भौतिक रूप से पुस्तकालय मौजूद हैं?

क्या छात्राएं उनका उपयोग कर रही हैं?

क्या पुस्तकें स्टॉक रजिस्टर में दर्ज हैं?

क्या पुस्तकों की गुणवत्ता एवं संख्या स्वीकृति के अनुरूप है?

क्या स्वतंत्र निरीक्षण रिपोर्ट उपलब्ध है?

💰 25.30 लाख रुपये की हर पाई की जांच क्यों जरूरी?

विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी सार्वजनिक परियोजना में केवल राशि स्वीकृत होना पर्याप्त नहीं होता।

निम्न बिंदुओं की जांच आवश्यक होती है—

✅ प्रशासनिक स्वीकृति

✅ तकनीकी अनुमोदन

✅ कार्य आदेश

✅ क्रय प्रक्रिया

✅ तुलनात्मक दर पत्रक

✅ बिल एवं वाउचर

✅ भुगतान अभिलेख

✅ स्टॉक रजिस्टर

✅ उपयोगिता प्रमाण पत्र

✅ भौतिक सत्यापन रिपोर्ट

यदि इनमें से कोई भी कड़ी कमजोर है तो संपूर्ण प्रक्रिया जांच के दायरे में आ सकती है।

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🧾 रिकॉर्ड नहीं, तो जवाबदेही कैसे तय होगी?

लोक प्रशासन विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी सरकारी व्यय की वैधता का आधार उसका अभिलेखीय रिकॉर्ड होता है।

यदि रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराया जाता, अधूरा दिया जाता है या विलंब से दिया जाता है तो यह प्रशासनिक जवाबदेही पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

⚠️ क्या केवल कागजों में हुआ काम?

यह जांच का विषय है कि—

● पुस्तकालयों का वास्तविक स्वरूप क्या है?

● स्वीकृत राशि का उपयोग किस मद में किया गया?

● क्या सामग्री वास्तविक रूप से खरीदी गई?

● क्या भुगतान वास्तविक आपूर्ति के आधार पर हुआ?

● क्या किसी स्तर पर प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ?

इन सभी प्रश्नों के उत्तर स्वतंत्र जांच से ही सामने आ सकते हैं।

🏛️ किन अधिकारियों की भूमिका जांच के दायरे में आ सकती है?

जांच एजेंसियों द्वारा निम्न स्तरों की भूमिका का परीक्षण किया जा सकता है—

🔹 स्वीकृति देने वाले अधिकारी

🔹 भुगतान स्वीकृत करने वाले अधिकारी

🔹 क्रय प्रक्रिया से जुड़े अधिकारी

🔹 विद्यालय स्तर के प्रभारी

🔹 सामग्री प्राप्ति प्रमाणित करने वाले अधिकारी

🔹 सूचना अधिकार के तहत जवाब देने वाले अधिकारी

📂 कौन-कौन से रिकॉर्ड तुरंत सुरक्षित किए जाने चाहिए?

विशेषज्ञों के अनुसार मामले की निष्पक्ष जांच के लिए निम्न रिकॉर्ड सुरक्षित किए जाने चाहिए—

✔️ मूल फाइल

✔️ नोटशीट

✔️ प्रशासनिक स्वीकृति

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✔️ बिल एवं वाउचर

✔️ बैंक भुगतान रिकॉर्ड

✔️ स्टॉक रजिस्टर

✔️ वितरण रजिस्टर

✔️ निरीक्षण प्रतिवेदन

✔️ RTI फाइल

✔️ डिजिटल रिकॉर्ड

🚨 रिकॉर्ड में बदलाव की आशंका? इसलिए जरूरी है स्वतंत्र जांच

जनहित से जुड़े मामलों में यह अक्सर देखा गया है कि शिकायत सामने आने के बाद रिकॉर्ड में संशोधन, पूरक दस्तावेज़ जोड़ने या फाइलों को व्यवस्थित करने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।

इसी कारण विशेषज्ञ स्वतंत्र एवं समयबद्ध जांच की आवश्यकता पर जोर देते हैं।

🎯 जनता पूछ रही है…

आखिर ₹25.30 लाख से बने पुस्तकालय आज किस स्थिति में हैं?

पुस्तकों की सूची सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती?

RTI में सीधी जानकारी देने में हिचकिचाहट क्यों?

क्या जिला स्तर से बाहर की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए?

क्या सार्वजनिक धन के उपयोग का सोशल ऑडिट कराया जाएगा?

📢 अब निगाहें जांच एजेंसियों पर

यह मामला केवल पुस्तकालयों का नहीं बल्कि सरकारी धन, पारदर्शिता, सूचना के अधिकार और प्रशासनिक जवाबदेही का प्रश्न बनता जा रहा है।

यदि सभी कार्य नियमसम्मत हुए हैं तो जांच से सत्य और स्पष्टता सामने आएगी। वहीं यदि कहीं प्रक्रिया संबंधी त्रुटियां या अनियमितताएं हुई हैं तो उनकी जिम्मेदारी भी तय हो सकेगी।

अब देखने वाली बात यह होगी कि संबंधित विभाग, जिला प्रशासन, सूचना आयोग या अन्य सक्षम प्राधिकारी इस मामले में क्या रुख अपनाते हैं और क्या स्वतंत्र जांच की दिशा में कोई ठोस कदम उठाया जाता है।

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RAJIV RASTOGI NEWS NETWORK SERVICE

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