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जांजगीर-चांपा का सरकारी भवन रहस्य: करोड़ों के भवन बने, विभाग नहीं पहुंचे… आखिर जनता के पैसे का हिसाब कौन देगा?

"भवन बने... विभाग गायब! आखिर किसके लिए खर्च हुई करोड़ों की सरकारी राशि?"

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विशेष खोजी रिपोर्ट | मीडिया हाउस एमपीजी

जांजगीर-चांपा जिले में सरकारी भवनों के निर्माण, उपयोग एवं प्रशासनिक योजना निर्माण को लेकर ऐसे सवाल खड़े हो रहे हैं जो सीधे तौर पर सार्वजनिक धन की उपयोगिता, प्रशासनिक जवाबदेही एवं विकास कार्यों की वास्तविकता पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं।

सरकारी अभिलेखों में अनेक विभागों के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर कार्यालय भवनों का निर्माण कराया गया, किंतु वास्तविक स्थिति यह बताती है कि कई भवन या तो अपने मूल उद्देश्य के लिए कभी संचालित ही नहीं हुए अथवा कुछ समय बाद उनकी पहचान एवं उपयोग पूरी तरह बदल गया।

🚨🏛️ पुरातत्व विभाग कार्यालय: अस्तित्व में आने से पहले ही बदल गई पहचान?

जांजगीर-चांपा की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण हेतु पुरातत्व विभाग का कार्यालय भवन निर्मित किया गया।

लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि—

✅ जिस उद्देश्य के लिए शासन ने भवन निर्माण की स्वीकृति दी थी,

✅ क्या वह उद्देश्य कभी पूरा हुआ?

✅ क्या पुरातत्व विभाग अपने स्वयं के भवन में कभी नियमित रूप से संचालित हुआ?

स्थानीय चर्चाओं एवं उपलब्ध तथ्यों के अनुसार भवन निर्माण पूर्ण होने के बाद उसमें पहले कुटुंब न्यायालय संचालित किया गया।

⚖️💰 45 लाख की अतिरिक्त लागत का सवाल

सूत्रों के अनुसार भवन में कुटुंब न्यायालय संचालित करने हेतु लगभग 45 लाख रुपये तक अतिरिक्त व्यय किया गया।

यदि यह तथ्य अभिलेखीय जांच में सत्य सिद्ध होता है तो कई महत्वपूर्ण प्रश्न स्वतः उत्पन्न होते हैं—

🔹 भवन निर्माण में मूल लागत कितनी थी?

🔹 कुटुंब न्यायालय संचालन हेतु अतिरिक्त संशोधन कार्य किस स्वीकृति से हुए?

🔹 क्या इसके लिए पृथक प्रशासनिक एवं वित्तीय स्वीकृति प्राप्त की गई थी?

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🔹 क्या मूल भवन की उपयोगिता एवं संरचना को परिवर्तित किया गया?

🔹 इस अतिरिक्त व्यय का वास्तविक लाभ किसे प्राप्त हुआ?

🔄🏢 कुटुंब न्यायालय गया… महिला थाना आ गया!

प्राप्त जानकारी के अनुसार कुछ समय तक कुटुंब न्यायालय संचालित होने के बाद वह भी अन्यत्र स्थानांतरित हो गया।

इसके बाद वही भवन महिला थाना के रूप में उपयोग में आने लगा।

यानी—

🏛️ पहले पुरातत्व विभाग,

⚖️ फिर कुटुंब न्यायालय,

👮 फिर महिला थाना।

एक ही भवन ने कई प्रशासनिक पहचानें बदल लीं, किंतु जिस विभाग के नाम पर भवन बना, वही विभाग आज भी अपने स्थायी एवं उद्देश्यगत कार्यालय संचालन से वंचित दिखाई देता है।

🏺📚 जिले की ऐतिहासिक धरोहर और बेघर पुरातत्व विभाग

जांजगीर-चांपा जिला पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से छत्तीसगढ़ के महत्वपूर्ण जिलों में गिना जाता है।

जिले में अनेक प्राचीन मंदिर, ऐतिहासिक स्मारक एवं सांस्कृतिक धरोहरें मौजूद हैं।

ऐसे जिले में यदि पुरातत्व विभाग के लिए निर्मित कार्यालय भवन अपने मूल स्वरूप में संचालित नहीं हो पाया, तो यह केवल भवन उपयोगिता का प्रश्न नहीं बल्कि विरासत संरक्षण की प्रशासनिक प्राथमिकताओं पर भी गंभीर सवाल खड़ा करता है।

🚧💸 करोड़ों के भवन… लेकिन विभाग अब भी किराए या अस्थायी परिसरों में!

यह मामला केवल पुरातत्व विभाग तक सीमित नहीं दिखाई देता।

जिले में ऐसे कई उदाहरण बताए जाते हैं जहां—

✅ भवनों का निर्माण पूर्ण हो चुका है,

✅ करोड़ों रुपये खर्च हो चुके हैं,

✅ निर्माण एजेंसियों को भुगतान हो चुका है,

लेकिन संबंधित विभाग अब भी अपने अधिकृत भवनों में संचालित नहीं हो रहे हैं।

🏭⚠️ उद्योग विभाग का करोड़ों का भवन खाली, संचालन सामुदायिक भवन में!

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सबसे आश्चर्यजनक उदाहरण उद्योग विभाग का बताया जाता है।

जानकारी के अनुसार—

🏢 जिला मुख्यालय में करोड़ों रुपये की लागत से उद्योग विभाग का भवन निर्मित किया गया,

लेकिन विभाग का संचालन आज भी चांपा स्थित एक छोटे से सामुदायिक भवन अथवा वैकल्पिक परिसर से किया जा रहा है।

यदि ऐसा है तो सवाल उठना स्वाभाविक है—

❓ जब भवन बन चुका है तो उपयोग क्यों नहीं हो रहा?

❓ क्या भवन तकनीकी रूप से अनुपयुक्त है?

❓ क्या निर्माण में कोई कमी है?

❓ क्या विभाग को भवन हस्तांतरित ही नहीं किया गया?

❓ या फिर प्रशासनिक समन्वय की विफलता इसका कारण है?

📊🔍 जनता पूछ रही है — आखिर सरकारी परिसंपत्तियों का वास्तविक उपयोग कहां है?

लोक वित्त विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भवन का निर्माण केवल भौतिक संरचना खड़ी करना नहीं होता।

जब तक उस भवन का उपयोग निर्धारित उद्देश्य के अनुरूप न हो, तब तक निवेशित सार्वजनिक धन की उपयोगिता अधूरी मानी जाती है।

यदि करोड़ों की परिसंपत्तियां वर्षों तक खाली पड़ी रहें तो यह स्थिति निम्न बिंदुओं की जांच की मांग करती है—

🔹 योजना निर्माण में त्रुटि

🔹 आवश्यकता आकलन में कमी

🔹 विभागीय समन्वय की विफलता

🔹 परिसंपत्ति प्रबंधन में लापरवाही

🔹 सार्वजनिक धन की उपयोगिता पर प्रतिकूल प्रभाव

⚖️🧾 किन दस्तावेजों की जांच आवश्यक?

जनहित एवं वित्तीय पारदर्शिता के दृष्टिकोण से निम्न अभिलेखों की स्वतंत्र जांच आवश्यक प्रतीत होती है—

✅ प्रशासकीय स्वीकृति

✅ तकनीकी स्वीकृति

✅ कार्यादेश

✅ निर्माण एजेंसी का विवरण

✅ लागत वृद्धि संबंधी दस्तावेज

✅ उपयोगिता प्रमाण पत्र

✅ भवन हस्तांतरण अभिलेख

✅ विभागीय कब्जा आदेश

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✅ भवन परिवर्तन संबंधी अनुमति

✅ अतिरिक्त संशोधन कार्यों की स्वीकृतियां

🚨📢 सबसे बड़ा सवाल: जिम्मेदार कौन?

यदि किसी भवन के निर्माण पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए और वह अपने मूल उद्देश्य के लिए उपयोग में नहीं आया, तो जवाबदेही तय होना आवश्यक है।

जिम्मेदारी केवल निर्माण एजेंसी की नहीं बल्कि—

🔹 योजना तैयार करने वालों,

🔹 स्वीकृति प्रदान करने वालों,

🔹 भवन हस्तांतरण करने वालों,

🔹 उपयोगिता सुनिश्चित करने वाले अधिकारियों,

सभी स्तरों पर निर्धारित की जानी चाहिए।

🔥📍 जनता की मांग: उच्चस्तरीय ऑडिट और स्वतंत्र जांच हो

जांजगीर-चांपा जिले में विभिन्न विभागों के लिए निर्मित भवनों की वर्तमान स्थिति, उपयोगिता, लागत, विभागीय कब्जा एवं वास्तविक संचालन की स्वतंत्र जांच कराई जानी चाहिए।

साथ ही यह भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए कि—

📌 किस भवन पर कितनी राशि खर्च हुई?

📌 वर्तमान में उसका उपयोग कौन कर रहा है?

📌 मूल विभाग वहां क्यों नहीं पहुंचा?

📌 खाली भवनों की संख्या कितनी है?

📌 जनता के धन से निर्मित परिसंपत्तियों का वास्तविक लाभ किसे मिल रहा है?

✍️ निष्कर्ष

जांजगीर-चांपा में सरकारी भवनों का यह रहस्य केवल ईंट, सीमेंट और कंक्रीट की कहानी नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक धन, प्रशासनिक योजना, जवाबदेही और जनविश्वास का प्रश्न है।

जब करोड़ों रुपये खर्च कर भवन बनाए जाएं और वे अपने मूल उद्देश्य से भटक जाएं, तब केवल भवन नहीं बल्कि शासन की विकास अवधारणा भी कठघरे में खड़ी दिखाई देती है।

अब निगाहें इस बात पर हैं कि क्या जिम्मेदार विभाग इस विषय पर पारदर्शी तथ्य जनता के सामने रखेंगे अथवा यह सवाल भी सरकारी फाइलों में दबकर रह जाएगा।

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RAJIV RASTOGI NEWS NETWORK SERVICE

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