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लोकसभा और विधानसभा चुनावों में उम्मीदवारों ने लाखों-करोड़ों कहां खर्च किए, जानें केवल एक रुपए में

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लोकसभा और विधानसभा चुनावों में उम्मीदवार चुनाव जीतने के लिए लाखों-करोड़ों रुपए खर्च करते हैं। इसके बावजूद चुनाव आयोग ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि आम आदमी भी महज एक रुपए खर्च करके यह जान सकता है कि किस उम्मीदवार ने चुनाव में कितना पैसा कहां -कहां व्यय किया। इसके लिए उसे आवेदन एक रुपए फीस के साथ जिला निर्वाचन अधिकारी को देना होगा।

आवेदक को व्यय रजिस्टर के निरीक्षण के साथ ही उसके प्रति पृष्ठ एक रुपए की दर से फोटो कापी भी मिल सकती है। दूसरी ओर चुनाव आयोग ने उम्मीदवारों द्वारा किए जा रहे व्यय को लेकर सख्त नियम भी बना रखे हैं।

चुनाव निपटने के बाद एक महीने के अंदर यदि किसी प्रत्याशी ने यह नहीं बताया कि उसने कितनी राशि व्यय की है तो उसे जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 10-क के तहत छह साल के लिए चुनाव लड़ने से वंचित किया जा सकता है। ऐसे अयोग्य उम्मीदवारों के नाम चुनाव आयोग जारी करता है। जिस दिन सूची जारी की जाती है उस दिन से अगले छह साल तक वह उम्मीदवार विधानसभा या लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य करार दिया जाता है।

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लोकसभा या विधानसभा चुनाव के दौरान इन अयोग्य उम्मीदवारों की सूची पूरे देश में भेजी जाती है, ताकि अयोग्य करार दिया गया प्रत्याशी कहीं से भी चुनाव न लड़ सके। हाल ही में चुनाव आयोग ने छत्तीसगढ़ के चुनाव व्यय न बताने वाले 79 प्रत्याशियों की सूची जारी की है, जिन्हें अयोग्य करार दिया गया है। इनमें से कुछ की अयोग्यता अवधि पूरी हो गई, बाकी की 2025-26 तक खत्म हो जाएगी।

रिटर्निंग अफसर नामांकन पत्रों की छंटाई के दौरान इस सूची को ध्यान में रखते हैं। जानकारों का दावा है कि अब तक ऐसा मामला सामने नहीं आया है कि अयोग्य उम्मीदवार ने कहीं से चुनाव लड़ा हो। चुनाव के पूर्व सूची जारी की जाती है, ताकि आरओ के संज्ञान में रहे और डिस्क्वालिफाइड कैंडिडेट कम से कम दो चुनाव से वंचित रहे।

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70 सालों में 25 हजार से 95 लाख तक बढ़ा चुनावी खर्च का ग्राफ

खर्च की सीमा मुद्रा स्फीति सूचकांक, महंगाई और वोटरों की संख्या के आधार पर तय की जाती है। इसमें राजनीतिक दलों से भी राय ली जाती है। 1951-52 में पहले चुनाव में लोकसभा चुनाव में 25 हजार रुपए व्यय करने की छूट थी। यह 1971 में बढ़ाकर 35 हजार रुपए हो गई। 1980 में 1 लाख रुपए और 1984 में 1.50 लाख रुपए तक कर दी गई थी। 1996 में व्यय सीमा बढ़ाकर 4.50 लाख रुपए कर दी गई। 1998 में 15 लाख तक बढ़ाई गई। 2004 में 25 लाख रुपए की गई। 2014 में इसे 70 लाख रुपए कर दिया गया था। केंद्र शासित प्रदेशों यह सीमा क्रमश: 75 लाख और 28 लाख रुपए हैं।

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