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रायपुरछत्तीसगढ़

देहदान में बेरुखी : किडनी-लिवर की वेटिंग इतनी कि प्रतीक्षा करते तीन बरस में 45 ने तोड़ दिया दम

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रायपुर। लगातार कोशिशों के बाद भी देहदान के प्रति लोगो को जागरुक करने में सफलता नहीं मिल पाई है। आंकड़े बताते हैं कि, बीते तीन साल में 45 लोगों ने किडनी, लिवर सहित अन्य अंग मिलने के इंतजार में अपनी जान गंवा दी।  वर्ष 2022 से 2025 के बीच कुल 320 लोगों ने राज्य अंग एवं उतक प्राधिकरण (सोटो) में अपना पंजीयन कराया था, जिनमें से 32 का प्रत्यारोपण पूरा हो पाया है, 45 की जान चली गई और बाकी वेटिंग में हैं। बदलती लाइफ स्टाइल की वजह से किडनी, लिवर से संबंधित बीमारी आम हो चुकी है।

डीकेएस, एम्स सहित अन्य निजी अस्पतालों में संबंधित विभागों में रहने वाली मरीजों की भीड़ इसका प्रमाण है। इलाज की संभावना खत्म होने के बाद कैडवर डोनरों से मिलने वाले अंग ऐसे रोगियों के नए जीवन का सहारा होते हैं। इसके लिए पंजीकृत अस्पतालों के माध्यम से सोटो के पास जरूरतमंद मरीजों का पंजीयन कराया जाता है ताकि उन्हें दधिचि मुनी जैसे महादानी के अंगों से नया जीवन मिल सके। यह उद्देश्य जागरुकता के अभाव में पूरा होता नहीं दिख रहा है क्योंकि तीन साल में 12 लोगों से मिले विभिन्न अंगों के माध्यम से 32 प्रत्यारोपण पूरा हो पाया है। सोटों के पास अभी भी 222 लोगों की वेटिंग लिस्ट है।

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वर्तमान स्थिति

  • किडनी 195, लिवर 25, अन्य उतक 2 यानी कुल 222 आवेदन पेंडिंग
  • अब तक 24 किडनी, 8 लिवर का प्रत्यारोपण हो चुका पूर्ण
  • अब तक 14 त्वचा, 14 कार्निया, 5 हार्ट वॉल्व, 1 लिवर दान में प्राप्त हुआ।

प्रत्यारोपण के बाद पांच की मौत
किडनी लिवर के इंतजार में पंजीकृत 45 लोगों की मृत्यु के अलावा पांच ऐसे लोगों ने भी दम तोड़ा जिनका प्रत्यारोपण हो चुका था। ट्रांसप्लांट के बाद उन्हें विभिन्न तरह की अन्य जटिलताएं हुई और उन्होंने जान गंवा दी। शेष 27 लोग दान में मिले अंगों के माध्यम से अपना जीवन सामान्य तरीके से जी रहे हैं। राज्य में अंतिम देह दान दुर्ग जिले के निजी अस्पताल के सीएमओ की मृत्यु के बाद उनके परिवार वालों ने अगस्त 2025 में किया था। इसके बाद कैडेवर डोनेशन तो नहीं हुआ पर सोटो की प्रतीक्षा सूची बढ़ती गई।

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नहीं हुई नई नियुक्त
राज्य में ब्रेनडेड मरीजों के अंगदान और प्रत्यारोपण का समन्वय करने वाला सोटो स्वंय अधिकारियों और संसाधनों के अभाव से जूझ रहा है। पिछले दो महीने इसके संचालक के लिए जिम्मेदार चिकित्सक की तलाश पूरी नहीं हो पाई है। बनाए गए इस प्राधिकरण का कार्यालय तो डीके अस्पताल परिसर में बनाया गया है मगर यहां जरूरी स्टाफ की तैनाती की जरूरत भी नहीं समझी गई है। पंजीकृत अस्पतालों में इसके समन्वयक तो बनाए गए मगर उनका परफारमेंस भी उल्लेखनीय नहीं हो पा रहा है।

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RAJIV RASTOGI NEWS NETWORK SERVICE

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