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जनता का काम या सत्ता के इशारे पर विकास? स्वीकृति से भुगतान तक सरकारी निर्माण तंत्र की अग्निपरीक्षा — कौन तय करता है कि किस क्षेत्र में कौन-सा काम होगा?

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विशेष रिपोर्ट | जनहित विश्लेषण | सार्वजनिक धन एवं प्रशासनिक जवाबदेही

पहला सवाल—काम जनता तय करती है या प्रभावशाली नेटवर्क?

लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की मूल अवधारणा यह है कि सार्वजनिक धन का उपयोग सार्वजनिक आवश्यकता के लिए हो। सड़क, नाली, पुलिया, पेयजल, भवन, स्ट्रीट लाइट, सामुदायिक अधोसंरचना या अन्य विकास कार्यों की प्राथमिकता आदर्श रूप से आवश्यकता, तकनीकी व्यवहार्यता, उपलब्ध बजट, स्वीकृत योजना और निर्धारित प्रशासनिक प्रक्रिया के आधार पर तय होनी चाहिए।

लेकिन अनेक क्षेत्रों में समय-समय पर यह सवाल सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनता रहा है कि क्या वास्तविक जरूरतमंद नागरिक द्वारा दिया गया प्रस्ताव उसी गति से आगे बढ़ता है, जिस गति से किसी प्रभावशाली राजनीतिक या ठेकेदारी नेटवर्क से जुड़ा प्रस्ताव?

यह आरोप नहीं, बल्कि जांच का केंद्रीय प्रश्न है।

दूसरा सवाल—क्या किसी राजनीतिक दल का कार्यकर्ता प्रशासनिक स्वीकृति दिला सकता है?

किसी राजनीतिक दल से जुड़ा होना अपने आप में अपराध नहीं है। लोकतंत्र में राजनीतिक कार्यकर्ता भी नागरिक हैं और वे जनता की समस्याएं प्रशासन तक पहुंचा सकते हैं।

लेकिन वास्तविक प्रश्न वहां उत्पन्न होता है जहां किसी व्यक्ति का राजनीतिक प्रभाव कथित रूप से प्रशासनिक प्राथमिकता, तकनीकी परीक्षण, बजट आवंटन या कार्यादेश को प्रभावित करने लगे।

क्या किसी सरकारी निर्माण कार्य की स्वीकृति का आधार—

जनता की वास्तविक आवश्यकता + तकनीकी परीक्षण + बजट उपलब्धता + नियमसम्मत प्रक्रिया

होना चाहिए?

या फिर—

राजनीतिक प्रभाव + व्यक्तिगत सिफारिश + ठेकेदारी नेटवर्क + प्रशासनिक संपर्क

निर्णायक बन रहा है?

यदि दूसरा मॉडल कहीं मौजूद है तो यह केवल भ्रष्टाचार का प्रश्न नहीं, बल्कि institutional neutrality और public accountability का प्रश्न बन जाता है।

तीसरा सवाल—आम नागरिक का प्रस्ताव कहां जाता है?

गांव का नागरिक सड़क चाहता है। मोहल्ला नाली चाहता है। किसान सिंचाई सुविधा चाहता है। ग्रामीण पुलिया चाहता है। विद्यार्थी सड़क और प्रकाश व्यवस्था चाहता है।

नागरिक आवेदन देता है।

फिर फाइल चलती है।

निरीक्षण होता है।

तकनीकी अनुमान बनता है।

प्रशासकीय स्वीकृति, तकनीकी स्वीकृति और वित्तीय प्रावधान जैसे चरण आते हैं—योजना एवं विभागीय नियमों के अनुसार।

लेकिन आम नागरिक को अक्सर यह पता ही नहीं चलता कि उसका प्रस्ताव किस टेबल पर है, किस अधिकारी के पास लंबित है, क्या तकनीकी रिपोर्ट बनी, अनुमान कितना है और स्वीकृति क्यों नहीं हुई।

यहीं से पारदर्शिता का असली परीक्षण शुरू होता है।

चौथा सवाल—“काम की स्वीकृति” के नाम पर कोई अनौपचारिक कीमत तय है क्या?

समाज में समय-समय पर यह चर्चा सुनाई देती है कि सरकारी काम की स्वीकृति से लेकर बिल भुगतान तक अलग-अलग स्तर पर “खर्च” करना पड़ता है।

लेकिन सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है:

किसी सरकारी निर्माण कार्य की वैध स्वीकृति के लिए कोई अनौपचारिक रिश्वत निर्धारित शुल्क नहीं है।

यदि कोई अधिकारी या बिचौलिया सरकारी काम कराने के बदले अवैध आर्थिक लाभ मांगता है, तो यह सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं बल्कि गंभीर जांच का विषय हो सकता है।

भारत के Prevention of Corruption Act, 1988 की धारा 7 सार्वजनिक सेवक द्वारा अनुचित लाभ लेने और उसके बदले सार्वजनिक कर्तव्य को अनुचित या बेईमानी से करने से संबंधित अपराधों को दंडित करती है।

धारा 7A भ्रष्ट या अवैध साधनों अथवा व्यक्तिगत प्रभाव के माध्यम से किसी लोक सेवक को अनुचित तरीके से प्रभावित करने के लिए अनुचित लाभ लेने को भी संबोधित करती है।

इसलिए प्रश्न यह नहीं कि “कितना प्रतिशत देना पड़ता है?”

प्रश्न यह है कि यदि कहीं ऐसी मांग की जाती है तो पैसा किसके पास जाता है, किस काम के लिए लिया जाता है और उसके बदले कौन-सा सरकारी निर्णय प्रभावित होता है?

पांचवां सवाल—क्या ठेकेदार का लाभांश ही पूरा खेल है?

किसी निर्माण कार्य की लागत में ठेकेदार का वैध लाभ, श्रम, सामग्री, मशीनरी, परिवहन, कर, ओवरहेड और अन्य अनुबंधित लागतें शामिल हो सकती हैं।

लेकिन यदि किसी कार्य में काल्पनिक या अनुचित “कट” की व्यवस्था हो तो उसका संभावित प्रभाव अंततः काम की गुणवत्ता पर पड़ सकता है।

मान लीजिए किसी कार्य की स्वीकृत लागत ₹1 करोड़ है।

यदि वास्तविक निर्माण पर खर्च होने वाली राशि किसी अवैध भुगतान या गैर-पारदर्शी व्यवस्था के कारण कम होती जाए, तो ठेकेदार के सामने तीन रास्ते हो सकते हैं—

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1. सामग्री की गुणवत्ता घटाना,
2. मात्रा या माप में हेरफेर करना,
3. निर्धारित specification से नीचे जाकर काम करना।

यहीं से जनता के पैसे का प्रश्न सीधे जनता की सुरक्षा से जुड़ जाता है।

खराब सड़क केवल खराब सड़क नहीं होती—वह दुर्घटना का जोखिम बन सकती है।

घटिया पुलिया केवल वित्तीय अनियमितता नहीं—वह बरसात में जान-माल का खतरा बन सकती है।

छठा सवाल—क्या “राजनीतिक कमीशन” नाम की कोई वैध व्यवस्था है?

नहीं।

किसी निर्वाचित प्रतिनिधि या राजनीतिक कार्यकर्ता के लिए सरकारी निर्माण कार्य की लागत में कोई वैध “कमीशन” स्वतः निर्धारित नहीं होता।

इसलिए यदि किसी कार्य की लागत में राजनीतिक व्यक्ति, बिचौलिये अथवा किसी प्रभावशाली व्यक्ति के लिए अवैध भुगतान की बात सामने आती है, तो उसे सामान्य ठेकेदारी खर्च बताकर समाप्त नहीं किया जा सकता।

उसकी स्वतंत्र जांच आवश्यक होगी।

और यदि किसी सार्वजनिक सेवक द्वारा अनुचित लाभ लिया गया हो, तो Prevention of Corruption Act की प्रासंगिक धाराएं लागू होने की स्थिति की जांच की जा सकती है। धारा 8 अनुचित लाभ देने या देने का वादा करने से संबंधित अपराध को भी संबोधित करती है।

सातवां सवाल—क्या ठेकेदार अधिकारी से अधिक शक्तिशाली हो सकता है?

सैद्धांतिक रूप से नहीं।

सरकारी व्यवस्था में अधिकार व्यक्ति की आर्थिक शक्ति से नहीं, कानून, नियम और delegation of powers से आते हैं।

ठेकेदार का कार्य अनुबंध के अनुसार निर्माण करना है।

अधिकारी का दायित्व है कि वह—

– तकनीकी स्वीकृति,
– गुणवत्ता,
– माप,
– कार्य की प्रगति,
– अनुबंध की शर्तें,
– भुगतान की पात्रता

जैसे विषयों की निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार निगरानी करे।

यदि किसी स्तर पर अधिकारी ठेकेदार के कथित दबाव में नियमों से समझौता करता है तो सवाल केवल ठेकेदार पर नहीं, निर्णय लेने वाले प्रत्येक सक्षम अधिकारी की जवाबदेही पर भी उठेगा।

आठवां सवाल—ऊपर से नीचे तक “सिस्टम” कैसे बन सकता है?

भ्रष्टाचार यदि कहीं होता है तो वह हमेशा एक व्यक्ति की जेब तक सीमित रहे, यह जरूरी नहीं।

संभावित जोखिम-श्रृंखला को इस तरह समझा जा सकता है—

राजनीतिक प्रभाव → प्रस्ताव की प्राथमिकता → प्रशासनिक फाइल → तकनीकी अनुमान → निविदा/चयन → कार्यादेश → साइट निरीक्षण → माप पुस्तिका → बिल → भुगतान

इनमें से किसी एक चरण में भी अनियमितता हो तो उसका असर आगे के चरणों पर पड़ सकता है।

लेकिन इस पूरी श्रृंखला को “भ्रष्ट नेटवर्क” कहना तभी उचित होगा जब दस्तावेजी और स्वतंत्र जांच से प्रमाण मिले।

यही कारण है कि File-to-Field Verification सबसे महत्वपूर्ण जांच पद्धति हो सकती है।

नौवां सवाल—कागज सही और जमीन पर काम गलत तो कौन जिम्मेदार?

सरकारी निर्माण में सबसे बड़ा विरोधाभास यही हो सकता है—

फाइल पर 100% काम।
जमीन पर 70% काम।

कागज पर specification पूरा।

जमीन पर सामग्री कम।

माप पुस्तिका में मात्रा पूरी।

स्थल पर मात्रा अलग।

भुगतान पूरा।

जनता को परिणाम अधूरा।

यदि ऐसी स्थिति किसी जांच में सामने आती है तो केवल ठेकेदार को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त नहीं होगा।

जांच को यह देखना चाहिए कि—

किसने माप लिया?
किसने सत्यापित किया?
किसने बिल पास किया?
किसने भुगतान स्वीकृत किया?
किसने गुणवत्ता प्रमाणित की?

यही है Responsibility Chain Analysis।

दसवां सवाल—क्या सरकारी खरीद और निर्माण व्यवस्था मनमानी की अनुमति देती है?

सरकारी वित्तीय व्यवस्था का मूल सिद्धांत पारदर्शिता, प्रतिस्पर्धा, निष्पक्षता और गैर-मनमानी है।

केंद्र सरकार के अद्यतन General Financial Rules में सार्वजनिक खरीद के लिए transparency, competition, fairness तथा arbitrariness को समाप्त करने पर जोर दिया गया है। साथ ही procuring authority पर efficiency, economy और transparency की जिम्मेदारी रखी गई है।

Government e-Procurement System में निविदाओं की जानकारी, bid submission और opening जैसी प्रक्रियाएं ऑनलाइन प्रकाशित की जाती हैं, जिससे प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सार्वजनिक scrutiny के लिए उपलब्ध रहता है।

इसलिए सवाल और गंभीर हो जाता है—

यदि प्रक्रिया ऑनलाइन है तो वास्तविक लाभार्थी, निविदा प्रतिस्पर्धा, चयन का कारण, कार्य की गुणवत्ता और अंतिम भुगतान की स्वतंत्र जांच क्यों न हो?

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ग्यारहवां सवाल—क्या “पहले से तय ठेकेदार” के लिए प्रक्रिया बनाई जा सकती है?

यह सबसे संवेदनशील जांच बिंदुओं में से एक है।

किसी विशेष ठेकेदार को लाभ पहुंचाने के लिए यदि निविदा की शर्तें इस प्रकार बनाई जाएं कि वास्तविक प्रतिस्पर्धा सीमित हो जाए, तो यह गंभीर प्रशासनिक प्रश्न पैदा कर सकता है।

इसलिए जांच में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं कि—

“टेंडर हुआ या नहीं?”

बल्कि यह देखना चाहिए कि—

कितने लोगों ने भाग लिया?
कितनी bids technically responsive थीं?
क्या शर्तें objectively justified थीं?
क्या अनुमानित लागत और awarded cost में असामान्य पैटर्न था?
क्या बार-बार वही contractor सफल हुआ?
क्या corrigendum अथवा eligibility conditions ने प्रतिस्पर्धा को प्रभावित किया?

यही Tender Pattern Analytics भ्रष्टाचार के संभावित संकेतों को पहचानने में मदद कर सकता है।

बारहवां सवाल—क्या उच्च अधिकारी सीधे ठेकेदार से जुड़े होते हैं?

यह अत्यंत गंभीर आरोप है और इसे बिना प्रमाण तथ्य के रूप में प्रकाशित नहीं किया जा सकता।

लेकिन जांच के लिए प्रश्न बिल्कुल वैध है—

क्या किसी अधिकारी और ठेकेदार के बीच ऐसी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष आर्थिक/व्यावसायिक कड़ी है, जो निर्णयों को प्रभावित करती हो?

इसकी जांच के लिए केवल मौखिक बयान पर्याप्त नहीं होंगे।

देखे जा सकते हैं—

– निविदा रिकॉर्ड,
– फाइल नोटिंग,
– आदेश श्रृंखला,
– माप पुस्तिका,
– भुगतान रिकॉर्ड,
– inspection reports,
– quality reports,
– संबंधित कंपनियों/फर्मों के दस्तावेज,
– हित-संघर्ष (conflict of interest) से जुड़े रिकॉर्ड,
– और जहां कानूनन उचित हो, वित्तीय/डिजिटल साक्ष्य।

तेरहवां सवाल—क्या जनता की शिकायत केवल “एक आवेदन” बनकर रह जाती है?

यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा है।

यदि किसी नागरिक ने सड़क, पुलिया, नाली, पानी या अन्य मूलभूत सुविधा के संबंध में आवेदन दिया और दूसरी ओर किसी प्रभावशाली व्यक्ति की सिफारिश पर समान प्रकृति का कार्य तेजी से स्वीकृत हो गया, तो दोनों फाइलों की comparative audit होनी चाहिए।

सवाल यह नहीं होना चाहिए कि शिकायतकर्ता कौन है।

सवाल होना चाहिए—

जरूरत किसकी अधिक थी?

यही प्रशासनिक निष्पक्षता का वास्तविक पैमाना है।

चौदहवां सवाल—क्या जनता के पैसे पर “कट” का कोई अदृश्य कर लगाया जा रहा है?

यदि किसी परियोजना में अवैध भुगतान होता है तो वह सरकारी बजट में दिखाई देने वाला खर्च नहीं होता।

लेकिन उसका प्रभाव दिखाई देता है—

कम गुणवत्ता।
कम सामग्री।
अधूरा काम।
जल्दी टूटती सड़क।
बार-बार मरम्मत।
दोबारा बजट।

इस प्रकार एक ही सार्वजनिक समस्या पर सरकार को बार-बार पैसा खर्च करना पड़ सकता है।

यानी कथित भ्रष्टाचार का वास्तविक बिल अंततः करदाता और आम नागरिक चुका सकता है।

पंद्रहवां सवाल—क्या बड़े अधिकारी “अछूत” हैं?

किसी भी जांच का सिद्धांत होना चाहिए—

No One Above Scrutiny.

यदि निचले स्तर के कर्मचारी की भूमिका की जांच होती है तो निर्णय की उच्चतम सक्षम अवस्था तक जिम्मेदारी की chain क्यों न देखी जाए?

किसने प्रस्ताव recommend किया?

किसने administrative approval दिया?

किसने technical sanction दी?

किसने tender process नियंत्रित किया?

किसने work order जारी किया?

किसने measurement किया?

किसने quality certify की?

किसने bill पास किया?

किसने payment authorize किया?

जिस व्यक्ति के हस्ताक्षर ने सरकारी धन को निजी भुगतान में बदलने की प्रक्रिया पूरी की, उसकी भूमिका जांच से बाहर कैसे रह सकती है?

सोलहवां सवाल—“काम हुआ” और “काम अच्छा हुआ”—दोनों एक बात नहीं हैं

सरकारी विकास का मूल्यांकन केवल expenditure utilization से नहीं होना चाहिए।

असली प्रश्न है—

Outcome क्या मिला?

₹50 लाख खर्च हुए—यह उपलब्धि नहीं।

₹50 लाख में निर्धारित गुणवत्ता का टिकाऊ सार्वजनिक परिसंपत्ति निर्माण हुआ—यह उपलब्धि है।

इसलिए प्रत्येक बड़े निर्माण कार्य के लिए—

Cost → Quantity → Quality → Time → Outcome

का पाँच-स्तरीय audit model विकसित किया जाना चाहिए।

सत्रहवां सवाल—क्या ठेकेदार-प्रशासन गठजोड़ की पहचान डेटा से संभव है?

हां, संभावित अनियमितताओं के संकेतों को डेटा के माध्यम से जांचा जा सकता है।

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उदाहरण के लिए—

Contractor Concentration Index

कुल कार्यों में किसी सीमित समूह की हिस्सेदारी कितनी है?

Repeat-Win Pattern

क्या वही फर्म बार-बार अलग-अलग विभागों में सफल हो रही है?

Estimate-to-Award Variance

अनुमानित लागत और अंतिम स्वीकृत/ठेके की राशि में क्या पैटर्न है?

Time-Extension Pattern

क्या कुछ ठेकेदारों को बार-बार extension मिलता है?

Variation Order Pattern

क्या मूल अनुबंध के बाद बार-बार अतिरिक्त कार्य जोड़े जाते हैं?

Quality-Failure Pattern

क्या किसी contractor के कार्यों में लगातार defects पाए जाते हैं?

Complaint-to-Action Ratio

कितनी जन शिकायतें आईं और कितनों पर वास्तविक कार्रवाई हुई?

यही आधुनिक Public Expenditure Intelligence का आधार बन सकता है।

अठारहवां सवाल—प्रशासन को किससे डरना चाहिए?

किसी राजनीतिक दल से नहीं।

किसी ठेकेदार से नहीं।

किसी बिचौलिये से नहीं।

प्रशासन को केवल कानून, संविधान और जनता के प्रति अपनी जवाबदेही का पालन करना चाहिए।

यदि कोई अधिकारी नियमसम्मत निर्णय लेने के बजाय किसी बाहरी प्रभाव के निर्देश पर निर्णय लेता है, तो यह प्रशासनिक स्वायत्तता के लिए गंभीर प्रश्न है।

और यदि कोई अधिकारी वास्तव में ईमानदार है तो पूर्ण रिकॉर्ड पारदर्शिता उसकी सबसे बड़ी सुरक्षा हो सकती है।

उन्नीसवां सवाल—जांच हो तो कैसी हो?

केवल खानापूर्ति वाली departmental inquiry नहीं।

बल्कि प्रत्येक संदिग्ध परियोजना की—

1. File Audit
2. Tender Audit
3. Financial Audit
4. Technical Audit
5. Site Verification
6. Quality Testing
7. Measurement Book Verification
8. Beneficiary/Community Verification
9. Payment Trail Examination
10. Responsibility Fixation

की जानी चाहिए।

जहां रिश्वत अथवा अनुचित लाभ के ठोस साक्ष्य हों, वहां सक्षम जांच एजेंसी द्वारा कानून के अनुसार कार्रवाई का प्रश्न अलग से निर्धारित होना चाहिए।

बीसवां सवाल—आखिर विकास किसके लिए?

यदि किसी गांव की सड़क इसलिए नहीं बनती कि वहां कोई प्रभावशाली व्यक्ति नहीं है, और किसी दूसरे क्षेत्र में काम इसलिए तेजी से होता है क्योंकि वहां राजनीतिक या ठेकेदारी प्रभाव मजबूत है, तो यह केवल विकास की असमानता नहीं होगी।

यह लोकतांत्रिक शासन की आत्मा पर प्रश्न होगा।

सरकारी खजाना किसी पार्टी का निजी कोष नहीं।

सरकारी अधिकारी किसी राजनीतिक नेटवर्क के निजी कर्मचारी नहीं।

ठेकेदार सार्वजनिक धन का मालिक नहीं।

और जनता किसी कृपा की याचक नहीं।

जनता कर देती है—सरकार उस धन की trustee है।

🔥 निष्कर्ष: असली लड़ाई “कौन कमीशन खा रहा है?” से आगे है

सबसे खतरनाक स्थिति वह नहीं जब कोई व्यक्ति रिश्वत मांगता है।

सबसे खतरनाक स्थिति वह है जब—

रिश्वत व्यवस्था बन जाए,
सिफारिश प्रक्रिया बन जाए,
बिचौलिया संस्था बन जाए,
ठेकेदार प्रभावशाली केंद्र बन जाए,
और जनता की शिकायत फाइल के नीचे दब जाए।

लेकिन इन गंभीर बातों को केवल सामाजिक चर्चाओं के आधार पर सत्य नहीं माना जा सकता।

हर आरोप का उत्तर दस्तावेज से होना चाहिए।

इसलिए अब समय है कि प्रशासन स्वयं सार्वजनिक रूप से बताए—

किस आधार पर काम चुने जाते हैं?
किस आधार पर प्राथमिकता तय होती है?
किस अधिकारी ने स्वीकृति दी?
किस तकनीकी अधिकारी ने गुणवत्ता प्रमाणित की?
किस प्रक्रिया से ठेकेदार चुना गया?
कितना भुगतान हुआ?
काम की वास्तविक भौतिक स्थिति क्या है?

यदि सब कुछ नियमसम्मत है तो रिकॉर्ड जनता के सामने रखने में संकोच क्यों?

और यदि कहीं अनियमितता है तो कार्रवाई केवल छोटे कर्मचारी तक सीमित क्यों?

जनता को “काम” नहीं, पारदर्शी और गुणवत्तापूर्ण काम चाहिए।

लोकतंत्र को “सिफारिश” नहीं, समान अवसर चाहिए।

प्रशासन को “प्रभाव” नहीं, नियम चाहिए।

और सार्वजनिक धन को “कमीशन” नहीं, परिणाम चाहिए।

यही वह बिंदु है जहां से एक गंभीर Independent Public Works Audit की आवश्यकता सामने आती है।

यह रिपोर्ट किसी व्यक्ति, अधिकारी, राजनीतिक दल या ठेकेदार को दोषी घोषित नहीं करती। इसका उद्देश्य उन सवालों को सार्वजनिक विमर्श में लाना है जिनका उत्तर दस्तावेजी, स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच से ही मिल सकता है।

जनहित का अंतिम प्रश्न यही है—
सरकारी धन से बनने वाला हर निर्माण वास्तव में जनता के लिए बन रहा है, या कहीं-कहीं जनता के नाम पर किसी और व्यवस्था का निर्माण हो रहा है?

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RAJIV RASTOGI NEWS NETWORK SERVICE

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