
बिजली का टावर खेत में, हाई-वोल्टेज लाइन सिर के ऊपर—किसान की जमीन का अधिकार आखिर कितना?
MEDIA HOUSE MPCG.COM | विशेष खोजी रिपोर्ट
छत्तीसगढ़ में बढ़ते पावर प्लांट, सोलर पार्क और ट्रांसमिशन नेटवर्क के बीच बड़ा भूमि-अधिकार प्रश्न
विशेष रिपोर्ट | MEDIA HOUSE MPCG.COM
छत्तीसगढ़ आने वाले वर्षों में ऊर्जा उत्पादन के एक बड़े केंद्र के रूप में विकसित हो रहा है। बड़े निजी एवं सरकारी पावर प्रोजेक्ट, सौर ऊर्जा परियोजनाएं, हजारों मेगावाट की उत्पादन क्षमता और उनसे जुड़ा विशाल Transmission Network—इन सबके लिए खेतों, राजस्व भूमि और ग्रामीण क्षेत्रों के ऊपर से High Voltage Transmission Lines तथा जमीन पर विशाल Transmission Towers का जाल बिछना स्वाभाविक है।
लेकिन इस विकास की एक दूसरी तस्वीर भी है—जिस किसान की जमीन से बिजली का टावर गुजरता है, उसके भूमि-अधिकार का वास्तविक दायरा कितना बचता है?
यही वह सवाल है जिस पर अब गंभीर सार्वजनिक बहस आवश्यक है।
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01. जमीन किसान की, लेकिन खेत के बीच खड़ा हो सकता है सैकड़ों टन का टावर
किसान के नाम राजस्व अभिलेख में दर्ज कृषि भूमि पर यदि Transmission Tower स्थापित किया जाता है तो इसका अर्थ यह नहीं कि पूरी जमीन का स्वामित्व बिजली कंपनी को मिल गया।
Transmission infrastructure के लिए कानून के तहत Right of Way (RoW), Tower Footing और उपयोग-अधिकार जैसी व्यवस्थाएं लागू हो सकती हैं। Electricity Act, 2003 की धारा 164 सक्षम सरकार को कुछ मामलों में विद्युत लाइसेंसी को Telegraph Authority जैसी शक्तियां प्रदान करने की अनुमति देती है।
अर्थात मामला केवल “सरकारी जमीन बनाम निजी जमीन” का नहीं है, बल्कि Ownership बनाम Statutory Right of User का भी है।
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02. किसान की जमीन के ऊपर का आसमान किसका?
यह प्रश्न बेहद महत्वपूर्ण है।
किसान के नाम दर्ज जमीन पर ऊपर से High Voltage Transmission Conductors गुजर सकते हैं। लेकिन इसका सामान्य अर्थ यह नहीं है कि बिजली कंपनी उस जमीन के ऊपर की पूरी अनंत ऊंचाई की मालिक बन जाती है।
Transmission कानून सामान्यतः लाइन डालने और उसके सुरक्षित संचालन के लिए आवश्यक अधिकार देता है, न कि किसान की संपूर्ण भूमि का स्वामित्व छीन लेता है।
भारतीय Telegraph कानून की धारा 10 के अंतर्गत भी ऐसी शक्ति को मुख्यतः उपयोग-अधिकार के रूप में देखा गया है; धारा 164 Electricity Act के माध्यम से उसके प्रावधान Transmission Lines पर लागू किए जा सकते हैं।
लेकिन असली समस्या यहां से शुरू होती है—
किसान जमीन का मालिक बना रहता है, पर उसके भूमि-उपयोग पर Safety Clearance, Tower Location, Conductor Clearance, Building Restrictions और विद्युत सुरक्षा मानकों के कारण व्यावहारिक सीमाएं लग सकती हैं।
यानी—
कागज पर स्वामित्व बरकरार, लेकिन जमीन के उपयोग की क्षमता प्रभावित।
यही अंतर किसान के लिए आर्थिक नुकसान का सबसे बड़ा प्रश्न बन सकता है।
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03. क्या किसान Tower को नुकसान पहुंचा सकता है? क्या जेल हो सकती है?
यहां भी तथ्य और अफवाह में अंतर करना जरूरी है।
किसान की अपनी जमीन पर Tower खड़ा होने का मतलब यह नहीं है कि वह उसे मनमाने ढंग से तोड़ सकता है।
Transmission infrastructure राष्ट्रीय/राज्य विद्युत व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। जानबूझकर Tower, conductor अथवा विद्युत infrastructure को नुकसान पहुंचाना गंभीर कानूनी परिणाम उत्पन्न कर सकता है।
लेकिन सिर्फ इस कारण कि टावर किसान की जमीन पर है, किसान स्वतः अपराधी नहीं बन जाता।
यदि किसान को Tower की स्थिति, मुआवजे, फसल क्षति, निर्माण-प्रतिबंध या RoW को लेकर आपत्ति है तो उसका समाधान कानूनी/प्रशासनिक आपत्ति, मुआवजा निर्धारण और सक्षम प्राधिकारी के समक्ष विवाद निस्तारण की प्रक्रिया से होना चाहिए।
Electricity Act में लाइसेंसी द्वारा काम करते समय कम से कम नुकसान पहुंचाने और हुई क्षति के लिए compensation की व्यवस्था भी है।
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04. सबसे बड़ा सवाल—टावर लगने के बाद किसान कितना निर्माण कर सकता है?
यहीं किसान की वास्तविक चिंता सामने आती है।
यदि खेत के बीच Tower Footing बन गई और उसके ऊपर से High Voltage Line गुजर रही है तो किसान उसी हिस्से में अपनी इच्छा से बहुमंजिला इमारत, औद्योगिक संरचना, ऊंचा गोदाम या अन्य निर्माण नहीं कर सकता।
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि पूरी खसरा भूमि स्वतः “निर्माण-विहीन” घोषित हो जाती है।
व्यावहारिक प्रतिबंध इस बात पर निर्भर करेंगे कि—
– Tower की exact location क्या है?
– Transmission voltage कितना है?
– Conductor की स्थिति और clearance क्या है?
– लागू electrical safety norms क्या हैं?
– प्रस्तावित निर्माण की ऊंचाई कितनी है?
– निर्माण Tower/line के किस हिस्से में है?
– संबंधित विभाग ने कौन-सा RoW/Safety Corridor निर्धारित किया है?
– स्थानीय भवन एवं विकास नियम क्या कहते हैं?
इसलिए प्रत्येक मामले में site-specific technical survey आवश्यक है।
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05. 220 KV, 400 KV, 765 KV—लाइन जितनी बड़ी, चिंता उतनी बड़ी?
High Voltage और Extra High Voltage Transmission Lines के मामले में Safety Clearance अत्यंत महत्वपूर्ण है।
लाइन के नीचे खेती करना और उसी स्थान पर ऊंची इमारत खड़ी करना समान विषय नहीं हैं।
किसान की जमीन का उपयोग खेती, सामान्य कृषि गतिविधियों या अनुमत गतिविधियों के लिए संभव हो सकता है, लेकिन लाइन के नीचे किसी भी ऊंचे निर्माण की अनुमति विद्युत सुरक्षा मानकों के अधीन होगी।
इसलिए किसान को यह लिखित रूप में जानने का अधिकार होना चाहिए कि—
“मेरे खसरा नंबर में Tower Footing कितने वर्गमीटर में है और Transmission Line का RoW Corridor कितनी चौड़ाई में है तथा इस Corridor में मेरे कौन-कौन से भूमि उपयोग प्रतिबंधित या नियंत्रित हैं?”
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06. सिर्फ Tower Footing नहीं—RoW Corridor भी महत्वपूर्ण
बहुत बार चर्चा केवल उस स्थान की होती है जहां Tower के चार पैर जमीन पर टिकते हैं।
लेकिन वास्तविक प्रभाव उससे कहीं बड़ा हो सकता है।
Transmission Line के लिए Right of Way Corridor निर्धारित किया जाता है।
इस Corridor में किसान की जमीन पर—
– पेड़ों की ऊंचाई,
– कृषि गतिविधियां,
– निर्माण,
– अस्थायी/स्थायी संरचनाएं,
– मशीनरी का उपयोग,
– भविष्य का विकास,
जैसे विषयों पर सुरक्षा आधारित प्रतिबंध हो सकते हैं।
इसी कारण केंद्र सरकार की RoW compensation guidelines में केवल Tower Footing नहीं, बल्कि Transmission Line के RoW Corridor से होने वाले नुकसान और भूमि-मूल्य में कमी को भी मुआवजे के संदर्भ में माना गया है।
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07. किसान को क्या सिर्फ फसल का मुआवजा मिलेगा?
यह अत्यंत महत्वपूर्ण सवाल है।
पुरानी व्यवस्था में कई स्थानों पर किसानों की शिकायत रही कि Transmission Line के लिए उन्हें मुख्यतः Crop and Tree Compensation दिया गया, जबकि जमीन के दीर्घकालीन उपयोग और मूल्य पर पड़ने वाले प्रभाव का प्रश्न अलग है।
केंद्र सरकार ने 2015 में Transmission RoW के लिए compensation framework जारी किया था। उसमें Tower Footing Area और RoW Corridor के लिए अलग-अलग compensation principles निर्धारित किए गए।
इसलिए किसान को केवल यह पूछकर संतुष्ट नहीं होना चाहिए कि—
“फसल का मुआवजा कितना मिला?”
बल्कि प्रश्न होना चाहिए—
“Tower Footing + RoW + भूमि-मूल्य में संभावित कमी + पेड़/फसल क्षति + निर्माण/उपयोग प्रतिबंध—इन सभी का मूल्यांकन कैसे किया गया?”
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08. जमीन के नीचे का अधिकार—किसान कितनी गहराई तक अपनी जमीन का उपयोग कर सकता है?
अब आता है दूसरा और उससे भी अधिक जटिल प्रश्न।
किसान कह सकता है—
“जमीन मेरी है, तो नीचे कितनी गहराई तक मेरी है?”
इसका कोई एक सार्वभौमिक उत्तर जैसे “10 फीट”, “50 फीट” या “100 फीट” नहीं है।
भूमि के नीचे अलग-अलग कानूनों के कारण अलग-अलग अधिकार और प्रतिबंध उत्पन्न हो सकते हैं।
विशेष रूप से—
Mineral Rights, Government Rights, Acquired Right of User, Pipeline Easement/Right of Way, Underground Cables, Water/Drainage Infrastructure तथा अन्य statutory utilities अलग-अलग कानूनी व्यवस्थाओं के अधीन हो सकते हैं।
इसलिए किसान यह मानकर जमीन के नीचे किसी भी गहराई तक खुदाई नहीं कर सकता कि “जमीन मेरी है इसलिए नीचे सब मेरा है।”
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09. Underground Pipeline भी जमीन के अधिकार को बदल सकती है
यदि किसी खेत के नीचे Petroleum, Mineral या अन्य वैधानिक Pipeline गुजरती है तो उसका अधिकार अलग कानून से निर्धारित हो सकता है।
उदाहरण के लिए Petroleum and Minerals Pipelines (Acquisition of Right of User in Land) Act, 1962 में Pipeline के लिए जमीन में Right of User प्राप्त करने, आपत्ति, प्रतिबंध और compensation की विस्तृत व्यवस्था है।
अर्थात—
जमीन किसान की हो सकती है, लेकिन उसके नीचे किसी Pipeline का वैधानिक Right of User भी हो सकता है।
ऐसी स्थिति में किसान को खुदाई, निर्माण अथवा अन्य गतिविधि से पहले संबंधित utility का alignment और safety requirement पता करना आवश्यक है।
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10. Foundation खोदने से पहले किसान क्या जांचे?
मान लीजिए किसान अपने खेत में—
मकान, गोदाम, शेड, फैक्ट्री, दुकान या कोई बड़ी Foundation
बनाना चाहता है।
तो केवल पटवारी रिकॉर्ड देखकर खुदाई शुरू करना सुरक्षित नहीं है।
पहले जांच होनी चाहिए—
LAND UTILITY CLEARANCE
1. खसरा नंबर की स्थिति
2. Transmission Tower की स्थिति
3. Overhead Power Line Alignment
4. RoW Corridor
5. Underground Electricity Cable
6. Petroleum/Mineral Pipeline
7. Water Pipeline
8. Gas Pipeline जहां लागू हो
9. Optical Fibre/Telecommunication Cable
10. Drainage/Canal/Other Underground Utility
11. संबंधित विभाग का Safety Clearance
12. प्रस्तावित Foundation की गहराई और स्थान
यानी भविष्य में किसान के लिए “Utility Mapping before Excavation” बेहद जरूरी विषय बनने वाला है।
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11. क्या किसान की जमीन की गहराई पर कोई सामान्य सीमा है?
कानून में सामान्य रूप से पूरे भारत के लिए ऐसा एक fixed numerical depth rule नहीं है कि हर निजी भूमि का अधिकार जमीन की सतह से ठीक इतने मीटर नीचे तक ही रहेगा।
भूमि के नीचे का अधिकार संबंधित कानून, भूमि के स्वभाव, खनिज अधिकार, अधिग्रहण/Right of User, easement, pipeline alignment, सरकारी परियोजना और स्थानीय नियमों से प्रभावित हो सकता है।
छत्तीसगढ़ में भूमि संबंधी मूल राजस्व ढांचा Chhattisgarh Land Revenue Code, 1959 से जुड़ा है।
इसलिए किसी किसान के प्रश्न का वास्तविक उत्तर उसके खसरा नंबर और उस जमीन के नीचे मौजूद/प्रस्तावित utility infrastructure की जांच के बाद ही दिया जा सकता है।
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12. किसान के लिए नया खतरा—“भूमि मेरी, लेकिन उपयोग किस सीमा तक?”
आने वाले समय में यह सवाल और गंभीर हो सकता है।
एक ही जमीन पर—
ऊपर Transmission Line,
सतह पर Tower,
जमीन में Pipeline,
और आसपास नई औद्योगिक परियोजना।
ऐसी स्थिति में किसान के पास कागज पर स्वामित्व होते हुए भी उसके भूमि उपयोग की स्वतंत्रता कई अलग-अलग statutory restrictions से प्रभावित हो सकती है।
यही कारण है कि केवल “मुआवजा दे दिया गया” कहकर पूरे मामले को समाप्त नहीं किया जा सकता।
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13. किसानों को मिलनी चाहिए “Land Rights Information Sheet”
हर ऐसी Transmission Project में प्रभावित भूमि मालिक को परियोजना शुरू होने से पहले एक स्पष्ट दस्तावेज दिया जाना चाहिए जिसमें लिखा हो—
खसरा नंबर | Tower Number | Tower Footing Area | RoW Width | Voltage | Line Height | Safety Restrictions | Permitted Land Use | Restricted Construction | Tree Restrictions | Compensation Basis | Grievance Authority
यदि यह जानकारी किसान को पहले से मिल जाए तो विवाद काफी कम हो सकते हैं।
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14. पावर सेक्टर का विस्तार जरूरी, लेकिन किसान की कीमत पर नहीं
छत्तीसगढ़ को ऊर्जा उत्पादन, उद्योग, निवेश और रोजगार के लिए Power Infrastructure की आवश्यकता है।
लेकिन Energy Transition और Industrial Expansion का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि ग्रामीण किसान अपनी जमीन पर बढ़ते infrastructure का अनिश्चितकालीन भार उठाता रहे।
सवाल Power Plant के विरोध का नहीं है।
सवाल है—
“Development का Cost कौन उठाएगा?”
यदि बिजली पूरे राज्य और देश के औद्योगिक विकास के लिए जा रही है तो जिस किसान की जमीन से Transmission Corridor गुजर रहा है, उसके नुकसान का वैज्ञानिक, पारदर्शी और न्यायसंगत मूल्यांकन भी होना चाहिए।
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15. अब जरूरी है—“Power Corridor Impact Audit”
छत्तीसगढ़ में तेजी से विकसित हो रहे Power Generation और Transmission Network के साथ प्रत्येक प्रभावित जिले में एक व्यापक Power Corridor Impact Audit की आवश्यकता पर विचार होना चाहिए।
इस Audit में प्रत्येक खसरा भूमि का—
GIS Mapping + Tower Footing Measurement + RoW Mapping + Land Value Assessment + Crop Loss Assessment + Tree Valuation + Construction Restriction Assessment + Underground Utility Mapping
किया जाना चाहिए।
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⚖️ कानूनी तस्वीर—किसान के अधिकार को एक वाक्य में समझें
Transmission Line लगने से जमीन का मालिकाना हक सामान्यतः स्वतः समाप्त नहीं होता; लेकिन कानून के तहत बिजली लाइसेंसी को लाइन/टावर लगाने और बनाए रखने के विशेष अधिकार मिल सकते हैं तथा इससे भूमि के उपयोग और मूल्य पर प्रभाव पड़ने पर compensation का प्रश्न पैदा होता है।
Electricity Act, 2003 की धारा 164 इसी प्रकार की Telegraph Authority powers से संबंधित है, जबकि संबंधित व्यवस्था में property को कम से कम नुकसान पहुंचाने और compensation के सिद्धांत मौजूद हैं।
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🚨 MEDIA HOUSE MPCG.COM का बड़ा सवाल
जब खेत किसान का है तो किसान को यह क्यों न बताया जाए कि उसके खेत के ऊपर कितनी ऊंचाई तक Safety Restriction है, जमीन पर Tower कितनी जगह घेरता है, RoW Corridor कितना है और जमीन के नीचे कौन-सी सरकारी या निजी Utility गुजर रही है?
क्या हर किसान को अपने खसरा नंबर का एक “Integrated Utility & Transmission Map” नहीं मिलना चाहिए?
क्या केवल फसल का मुआवजा पर्याप्त है, जबकि वर्षों तक जमीन के उपयोग और बाजार मूल्य पर प्रभाव पड़ सकता है?
क्या Tower Footing और पूरे RoW Corridor के प्रभाव का स्वतंत्र मूल्यांकन होना चाहिए?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या Power Infrastructure के विस्तार के साथ Farmer Land Rights का भी समानांतर संरक्षण सुनिश्चित किया जा रहा है?
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🔎 निष्कर्ष
छत्तीसगढ़ में बढ़ता Power Generation और Transmission Network राज्य के आर्थिक भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है। लेकिन Energy Infrastructure और Land Rights के बीच संतुलन स्थापित करना उतना ही आवश्यक है।
किसान की जमीन केवल एक “Transmission Route” नहीं है।
वह उसकी आजीविका, संपत्ति, भविष्य की आर्थिक सुरक्षा और अगली पीढ़ी की पूंजी है।
इसलिए आने वाले समय में बहस केवल इस बात पर नहीं होनी चाहिए कि—
“कितने मेगावाट बिजली बनेगी?”
बल्कि यह भी पूछा जाना चाहिए—
“कितने किसानों की जमीन से बिजली गुजरेगी और उन किसानों के अधिकारों की कीमत कौन तय करेगा?”
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