
‘भारत के पास बहुत कम समय है’, विश्व बैंक की चेतावनी; कहा- 75 साल में अमेरिका…
कम आय वाले देशों के लिए बढ़ी चुनौतियां
विश्व बैंक के चीफ इकोनॉमिस्ट इंद्रमीत गिल ने अपनी एक रिपोर्ट उद्योग चैंबर सीआईआई के ग्लोबल इकोनॉमिक पॉलिसी फोरम कार्यक्रम में पेश की। गिल ने अपनी प्रजेंटेशन में बताया कि पिछले दो-ढ़ाई दशकों का डाटा बताता है कि कम आय वाले देशों के लिए आर्थिक प्रगति करना लगातार चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। भू-राजनैतिक तनाव लगातार बढ़ रहा है, कोराबार के संरक्षण को लेकर विकसित देशों का रवैया कड़ा होता जा रहा है, नीतिगत अस्थिरता है, ब्याज दरें ज्यादा है, प्राकृतिक आपदाएं ज्यादा हो रही हैं।
भारत पर बढ़ा कर्ज का बोझ
मध्यम आय वाले वर्ग के देशों के बारे में कहा गया है कि इनके पास पूंजी भी कम है और पूंजी के इस्तेमाल की इनकी क्षमता भी खास नहीं है। इन देशों पर बढ़ते कर्ज के बोझ को एक बड़ी चुनौती के तौर पर भी पेश किया गया है। बताते चलें कि भी भारत पर भी विदेशी कर्ज का बोझ कोविड के बाद काफी तेजी से बढ़ा है।
- पहला- भारत में काफी ज्यादा गैर उत्पादक कंपनियां कारोबार में हैं।
- दूसरा- महिलाओं को लगातार श्रम बाजार से अलग रखा गया है।
- तीसरा- भारत में ऊर्जा की लागत काफी ज्यादा है।
तेजी से विस्तार नहीं करती कंपनियां
भारतीय कंपनियों के बारे में कहा गया है, जो सक्षम हैं, वह तेजी से विस्तार नहीं करती और जो अक्षम हैं, उन्हें कारोबार से बाहर करना मुश्किल है। विकसित भारत बनने के लक्ष्य को आपात स्थिति के तौर पर लेने का सुझाव दिया गया है। भारत के पक्ष में घरेलू व वैश्विक स्थिति की बात भी स्वीकार की गई है, लेकिन यह भी कहा गया है कि बहुत ज्यादा समय नहीं है। प्रतिभाओं को पुरस्कृत करने और क्षमता में सुधार को एक प्रमुख कारक के तौर पर चिन्हित किया गया है, जिसका व्यापक असर होगा। जिस तरह से अमेरिका ने 60-70 के दशक में सभी को बराबरी का अवसर दिया वैसा ही भारत को करना होगा।



