
आकाशीय बिजली को स्टोर कर इस्तेमाल की दिशा में चल रहा शोध, सफलता मिली तो पावर की समस्या हो जाएगी खत्म
धनबादः वज्रपात, आकाशीय बिजली, ठनका या फिर थंडरिंग इस प्राकृतिक आपदा ने कारण आए दिन लोग अपनी जान गंवा रहे हैं. पिछले दिनों में बिहार में वज्रपात से 80 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी. वहीं झारखंड में भी आकाशीय बिजली के कारण लोगों की जान जा रही है. यही नहीं देश के अन्य हिस्सों के साथ ही विश्व के कई देशों में भी ठंडरिंग के कारण जान-माल का नुकसान होता है.
आईआईटी आईएसएम के प्रोफेसर ने बतायी वजह
इस संबंध में ईटीवी भारत संवाददाता नरेंद्र निषाद ने आईआईटी आईएसएम के जियोलॉजी विभाग के प्रोफेसर अनूप कृष्ण प्रसाद से खास बातचीत की. जिसमें प्रो.अनूप ने वज्रपात की विस्तृत जानकारी दी. उन्होंने कहा कि जमीन पर गिरने वाली आकाशीय बिजली को स्टोरेज कर उसका इस्तेमाल करने की दिशा में शोध चल रहा है. हालांकि इसमें अभी समय लगेगा यह कहना मुश्किल है, लेकिन अगर यह शोध सफल होता है तो जिस तरह से अभी बिजली उत्पादन करना पड़ रहा है, इसकी जरूरत नहीं पड़ेगी.
क्यों जमीन पर गिरती है आकाशीय बिजली?
प्रो. अनूप कृष्ण प्रसाद ने बताया कि आकाशीय बिजली, वज्रपात, ठनका या फिर थंडरिंग यह बादलों के कारण होता है. मौसम गड़बड़ होने के कारण बदल काफी तेजी से मूव करते हैं. इस कारण बादल में डिफरेंट चार्ज बनते हैं. जमीन में आयरन की मात्रा होने के कारण इसमें एफई प्लस या एफई थ्री प्लस चार्ज बनता है. बादल में जब निगेटिव चार्ज एक जगह जमा होते हैं, तो बैटरी की तरह ही प्लस और माइनस यानी नेगेटिव और पॉजिटिव दो स्थानों पर बनते हैं. वहां से चार्ज ट्रांसफर होता है. यही चार्ज ट्रांसफर लाइटनिंग के रूप में दिखाई देती है. जिसमें चमक के साथ एक जोरदार आवाज भी होती है. बादल से बादल में और हवा में भी यह कनेक्टिंग होते हैं, लेकिन जब बादल से हवा और फिर जमीन में कनेक्टिंग हो जाता है, तो यह क्लाउड टू ग्राउंड हो जाता है. फिर वह हमारे लिए नुकसानदायक होता है.



